Tuesday, March 3, 2026

ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत

🍂प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में ग्रहणों को लेकर प्रचलित पौराणिक धारणाओं के विपरीत, आर्यभट ( पञ्चमी शताब्दी के उत्तरार्ध से षष्ठी शताब्दी के मध्य तक ) ने सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की।  उनकी अवधारणाएँ आधुनिक खगोल विज्ञान से पूर्णतः संगत हैं। एतदतिरिक्त यह लेख समकालीन भारतीय समाज में व्याप्त ग्रहण-सम्बन्धी अंधविश्वासों की आलोचनात्मक समीक्षा भी करता है। ग्रहण सदियों से मानव सभ्यता हेतु जिज्ञासा तथा भय का विषय रहे हैं। विश्व की अनेक संस्कृतियों में इन्हें दैवी या दानवी शक्तियों से सम्बद्ध किया गया। भारत में भी राहु-केतु संबंधी पौराणिक मिथक दीर्घकाल तक ग्रहण की व्याख्या का आधार रहे। किंतु 5वीं–6वीं शताब्दी में आर्यभट ने इन मान्यताओं को अस्वीकार कर ग्रहणों को एक खगोलीय एवं गणितीय परिघटना के रूप में परिभाषित किया।

आर्यभट का प्रमुख ग्रंथ आर्यभटीयम्  ( अनुमानत: 499 ईस्वी में प्रणीत) भारतीय खगोल विज्ञान का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। इसके गोलपाद में ग्रहों की गति, पृथ्वी की छाया तथा सूर्य-चंद्र संबंधों का स्पष्ट विवेचन प्राप्त होता है। आर्यभट के अनुसार ग्रहण किसी दैत्य द्वारा ग्रहों को निगलने की घटना नहीं है, अपितु यह सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की सापेक्ष स्थिति से उत्पन्न होने वाली छाया-परिघटना है। आर्यभट का प्रसिद्ध श्लोक उल्लेख करता है- "छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूच्छाया ॥" (आर्यभटीयम्, गोलपाद 4/37) अर्थात् जब चंद्रमा सूर्य तथा पृथ्वी के मध्य आकर सूर्य को आच्छादित करता है, तो उस स्थिति को सूर्यग्रहण कहते हैं तथा जब पृथ्वी की विशाल छाया चंद्रमा पर पड़ती है,तो ऐसी स्थिति को चन्द्रग्रहण कहते हैं।

 व्याख्या आधुनिक खगोल-विज्ञान की परिभाषा से पूर्णतः साम्य स्थापित करती है, जहाँ ग्रहण को Umbra तथा Penumbra की छाया-संरचना के माध्यम से प्रबोध कराया जाता है। आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, ग्रहणों की गणना न्यूटनियन यांत्रिकी तथा खगोलीय ज्यामिति पर आधारित है एवं  ग्रहणों की तिथि, अवधि तथा प्रकार की सटीक भविष्यवाणी संभव है। आर्यभट ने  स्व-समय में ही ग्रहणों की गणना, चंद्र-कक्षा, तथा छाया की दीर्घता सदृश विषयों पर गणितीय सूत्र दिए, जो उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा का पूर्वगामी सिद्ध करते हैं। यह एक ऐतिहासिक विडंबना है कि जिस सभ्यता ने ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या दी, उसी सभ्यता में अद्यापि ग्रहण को अशुभ, दोषपूर्ण तथा सूतक-जन्य माना जाता है। अद्यापि ग्रहण के समय भोजन-वर्जना, धार्मिक भय, तथा गर्भवती स्त्रियों से सम्बंधित आशंकाएँ सामाजिक विमर्श का अंग हैं, जबकि इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह स्थिति वैज्ञानिक चेतना और परंपरागत अंधविश्वास के मध्य गहरे द्वंद्व को दर्शाती है।

आर्यभट का ग्रहण-सिद्धांत यह प्रमाणित करता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान तर्क, निरीक्षण तथा गणना पर आधारित था। ग्रहणों के विषय में व्याप्त अंधविश्वास न तो भारतीय ज्ञान परंपरा का अनिवार्य अंग हैं तथा न ही शास्त्रीय विज्ञान का निष्कर्ष। अतः आवश्यक है कि आर्यभट सदृश वैज्ञानिकों को केवल गौरवगाथा तक सीमित न रखा जाए, अपितु उनके वैज्ञानिक चिंतन को शिक्षा तथा सामाजिक चेतना का अंग निर्मित किया जाए क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टि का पुनरुद्धार ही भारतीय परंपरा की यथार्थ निरंतरता है।
                   ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

No comments:

Post a Comment

ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत

🍂प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में ग्रहणों को लेकर प्रचलित पौराणिक धारणाओं के विपरीत, आर्यभट ( पञ्चमी शताब्दी के उत्तरार्ध से षष्ठी शताब्दी के...