Sunday, August 21, 2022

प्रो. पाण्डेय को मिला "संस्कृत-गौरव सम्मान"

उत्तर प्रदेश का चित्रकूट जनपद रामायण काल से ही अध्यात्म एवं प्राकृतिक सम्पदा-सम्पन्न रहा है। यह हमारे आराध्य श्रीराम की कर्मस्थली तो रहा ही, साथ ही अनेक ऋषि-मुनियों की तपोस्थली भी है। यहाँ जन्मे कई प्रतिभाशाली एवं विद्वानों ने देश,विदेश में  इसका गौरव बढ़ाया है। यह सच है कि कई वर्षों से डाकुओं से प्रभावित रहने के कारण यह क्षेत्र विकास की राह पर कदम नहीं रख सका था किन्तु यहाँ के प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों की प्रतिभा पर कोई आँच न आ सकी। ये व्यक्तित्व निरन्तर वाग्देवी की उपासना एवं सृजन में संलग्न  रहे।


 इन्हीं व्यक्तित्वों में एक नाम है प्रो.रमाकान्त पाण्डेय का जिनका जन्म मानिकपुर तहसील के अंतर्गत बीहड़ में बसे सकरौंहा गाँव में हुआ। 


09 अगस्त सन् 1966 को जन्मे प्रो. पाण्डेय की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में तथा माध्यमिक शिक्षा मानिकपुर स्थित श्री मती पकौआ देवी संस्कृत महाविद्यालय में हुई। आगे की शिक्षा हेतु ये वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय गये। इसके बाद डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर से  विश्वप्रसिद्ध मनीषी आचार्य प्रवर प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी के निर्देशन में शोधकार्य करके पी-एच.डी. एवं डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की। 

उच्च शिक्षा की डिग्रियाँ हासिल कर प्रो.पाण्डेय सर्वप्रथम पूना विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुए। तदनन्तर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय,नई दिल्ली में डायरेक्टर,जयपुर परिसर में प्रोफेसर  तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के  दूरस्थ शिक्षा-विभाग के अधिष्ठाता पद को अलंकृत करते हुए  केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के विभिन्न परिसरों में अध्यापन-कार्य किया है। देश के अतिरिक्त बैंकॉक आदि विदेशों में दिए गए इनके अनेक व्याख्यानों से कई संस्कृतानुरागी एवं शोधार्थी लाभान्वित हुये हैं।वर्तमान में आप केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर में डायरेक्ट के पद को अलंकृत कर रहे हैं।

व्याकरण,साहित्य,नव्यन्याय,भारतीय एवं पाश्चात्य समीक्षा शास्त्र,लिपि-विज्ञान,तथा काव्यशास्त्र प्रभृति विभिन्न विधाओं में विशेषज्ञता रखने वाले, संस्कृत,संस्कृति एवं साहित्य-साधना में रत प्रो.पाण्डेय न केवल उद्भट विद्वान् हैं अपितु उत्कृष्ट रचनाकार भी हैं। इनके द्वारा प्रणीत कुल 65 ग्रन्थ,182 शोधपत्र तथा अनेक समीक्षाग्रन्थ, कविताएँ, कहानी आदि प्रकाशित हैं। समीक्षा एवं अनुसन्धान के क्षेत्र में विशेष उपलब्धि रखने वाले प्रो. पाण्डेय को अब तक लगभग 15 राष्ट्रस्तरीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।


 पुरस्कार एवं सम्मान की शृंखला में प्रो.पाण्डेय को अभी 20 अगस्त 2022 को "अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन,नई दिल्ली" द्वारा एक लाख रुपये की राशि,सम्मान चिह्न एवं श्रीफल देकर "संस्कृत-गौरव सम्मान" से अलंकृत किया गया है। 

प्रो. पाण्डेय को प्राप्त हुए इस सम्मान से न केवल इनके माता-पिता( पं. श्री जयनारायण पाण्डेय-स्व.विद्यावती),सहोदर कनिष्ठ भाई  एआरटीओ डॉ. उदित नारायण पाण्डेय  का नाम रोशन हुआ है बल्कि  सकरौंहा गाँव,चित्रकूट जनपद सहित समस्त संस्कृत जगत् का गौरव बढ़ा है। चित्रकूट के ऐसे व्यक्तित्व निश्चित रूप से इस क्षेत्र के युवाओं तथा सरस्वती के उपासकों के लिए प्रेरणा एवं उत्साह के स्रोत हैं।

इस महती उपलब्धि हेतु प्रो. रमाकान्त पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई💐🙏
                     ✍️ अनुज पण्डित

Friday, July 8, 2022

पुत्री द्वारा पिता के पैर छूने का रिवाज पुराना है

संस्कृत जगत् के मार्तण्ड कविकुलगुरु कालिदास की सर्वोत्कृष्ट सर्जना "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" के चतुर्थ अंक में एक श्लोक है-
                             🍂
अभिजनवतो: भर्तु: श्लाघ्ये स्थिता गृहिणीपदे,
विभवगुरुभि: कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं,
मम विरहजां न त्वं वत्से शुचं गणयिष्यसि।।४/१९

         टीकाकारों ने यह श्लोक श्लोकचतुष्टयम् के अंतर्गत रखा है जिसका हिंदी अनुवाद है-

जब शकुंतला पतिगृह जाने को तैयार होती है तो पिता को छोड़ने का दुःख उसे व्यथित कर देता है, तब उसके धर्मपिता काश्यप कहते हैं कि- पुत्री! तुम इस प्रकार से दुःखित न हो। तुम महाकुलीन पति के प्रशंसनीय गृहस्वामिनी अर्थात् महारानी पद पर अधिष्ठित होकर, ऐश्वर्य के कारण महत्त्वपूर्ण कार्यों में हरक्षण व्यस्त होकर और शीघ्र ही पूर्वदिशा जिस प्रकार पवित्र सूर्य को जन्म देती है, उसी प्रकार पवित्र चक्रवर्ती पुत्र को जन्म देकर, मेरे वियोग के दुःख को भूल जाओगी।

इतना सुनते ही शकुंतला, पिता के चरणों में गिर पड़ती है। श्लोक के ठीक नीचे ही कोष्ठक में यह पंक्ति लिखी है- "शकुन्तला पितु: पादयो: पतति।"

प्रत्येक बेटी ससुराल जाने के बाद अपनी जिंदगी के कार्यों में इतना रम जाती है कि उसे मायके का वियोग सताता नहीं है। बेटी जब माँ बन जाती है तो अपना सारा प्यार,सारा ध्यान पुत्र की परवरिश में लगा बैठती है लिहाज़ा मायका छूटने का दुःख उसे व्यथित नहीं करता । जब ऐसा आशीष भरा वचन शकुंतला ने पिता के मुख से सुना तो उनके पैर छू लेती है इसका अर्थ है कि महाभारतकाल में बेटी अपने पिता के पैर छूती थी और कालिदास जिस स्थान से सम्बंध रखते थे वहाँ भी ऐसा चलन है कि बेटियाँ पिता के पैर छुए।

हमारी भारतीय सनातन संस्कृति कितनी रहस्यमयी और वैविध्यता से परिपूर्ण है न! बेटी द्वारा पिता के पैर छूने का रिवाज भारत के सभी प्रान्तों में नहीं है किंतु कुछ प्रान्तों में था और आज भी है। यह रिवाज सभी प्रान्तों में भले न हो किन्तु बेटी की विदाई के समय संताप और आँसू बहाने का रिवाज  सभी प्रान्तों में क्योंकि बेटी है ही ऐसी कि उसके घर से जाते समय परिजनों के आँसू छलक आते हैं।तभी तो एक जगह काश्यप ऋषि ने कह दिया कि जब मुझ जैसे तपस्वी का यह हाल है तो गृहस्थियों की भला क्या स्थिति होती होगी!
          
         ✍️ अनुज पण्डित

Tuesday, April 12, 2022

उद्देश्यपरक शिक्षा

शिक्षा एक ऐसा साधन है जिसके सहारे युवा पीढ़ी अपना तथा अपने राष्ट्र का भविष्य सँवार सकती है। कहा जाता है कि बालक एक नवांकुर की तरह होता है, उसमें जिस प्रकार का खाद-पानी डाला जायेगा उसी प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलेंगे।अस्तु शिक्षा का स्वरूप कैसा हो?-इस पर उचित विचार करना परमावश्यक है,क्योंकि आज जैसी शिक्षा बालक को प्रदान की जायेगी तदनुसार ही देश की भावी निर्मिति का स्वरूप होगा। 

मनुष्य की तीनों स्थितियों (भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक ) के अनुरूप ही प्रत्येक बालक को शिक्षा प्रदान की जानी चाहिये किन्तु विडम्बना यह है कि सम्प्रति मात्र और मात्र भौतिक शिक्षा पर ही ध्यान आकृष्ट किया जा रहा है।

दुनिया में शांति हेतु प्रयास करने वाले लब्ध-नोबेल पुरस्कार नेल्सन मण्डेला ने शिक्षा के महत्त्व पर जोर देते हुये कहा कि - "दुनिया में सर्वाधिक शक्तिशाली हथियार 'शिक्षा' है, जो दुनिया को परिवर्तित कर सकती है।"

यदि उद्देश्यपरक शिक्षा बालक को प्रदान की जायेगी तो यही शिक्षा उसके कलम की ताकत बनेगी जिसके माध्यम से वह बालक समाज में प्रतिष्ठित होता हुआ समय के साथ अपने कर्त्तयों और अधिकारों के प्रति सजग होकर पूरे विश्व में एक सकारात्मक परिवर्तन कर सकता है।

आज देश में उद्देश्यहीन और राजनीतिक दलदल में फँसकर युवा जिस प्रकार अपना भविष्य बिगाड़ रहे हैं, उसे देखकर अफ़सोस होता है । आत्मश्लाघा और झूठी परप्रशंसा से मदान्ध होकर भारत के अधिकांश युवा अपने कर्तव्यों से दूर समाज के उन दिखावटी लोगों के पिछलग्गू बनकर दौड़ रहे हैं ,जो निजी स्वार्थ के ख़ातिर इन भटके हुये युवाओं का उपयोग करते हैं।

 विभिन्न संगठनों की क्रियाविधि एवं नारेबाजी करने में मशगूल इन युवाओं को अपनी खाली जेब तथा अपने परिवार की जिम्मेदारी का तनिक भी ख्याल नहीं रहता ।वो यह भूल जाते हैं कि समाज सेवा तब सार्थक होती है, जब हम अपनी निजी जिम्मेदारियों का  भी निर्वहन बखूबी कर लेते हों 

आज  बहुतेरे युवाओं की की कमजोर नस यह है कि वे अध्ययन-चिंतन से विमुख मात्र और मात्र व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से मिलने वाले खोखले ज्ञान पर अभिमान करते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर मिलने वाली शिक्षा इन युवाओं को भ्रमित और तथ्यहीन बनाने के लिये पर्याप्त है। इसीलिये उचित शिक्षा  और विवेक की महती आवश्यकता है ताकि अफ़वाहों के वशीभूत न होकर युवा आपस में परस्पर विचारों की जंग करने से बचें।

विभिन्न संगठनों से जुड़कर मानवहित के लिये कार्य करना बुरी बात नहीं किन्तु इसके लिये अपनी शिक्षा को अधूरी छोड़ देना, अधिकारों तथा कर्त्तव्यों से भलीभाँति परिचित न होना ,संस्कारों की बलि चढ़ाते हुये खुद को समाजसेवी कहना शोभनीय नहीं।सर्वप्रथम विचारों को मजबूत करना होगा तथा एक प्रभावी और चारित्रिक व्यक्तित्व का निर्माण करना होगा तब जाकर कहीं किसी संगठन से जुड़कर मानवहित की बात सोचनी और करनी चाहिये।

प्रत्येक युवा को ऐसी शिक्षा और चिंतन की जरूरत है जो उसके जीवन में सकरात्कमता को स्थान देने में सहायक हों तथा मानव-जीवन में सन्तुलन बनाने हेतु कारगर हों ।युवाओं को यह बात मन-मस्तिष्क में बैठानी ही होगी कि आज दुनिया में जो संकट, विद्वेष,भ्रष्टाचार,अराजकता, आतंकवाद,भूख,हिंसा  तथा बीमारी जैसी समस्याएँ व्याप्त हैं उनसे निजात पाने हेतु सदा ईमानदारी से प्रतिबद्ध रहेंगे ताकि सारी दुनिया में एकता एवं शांति की स्थापना हो सके।

प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ.जगदीश गाँधी ने अपने लेख 'शिक्षा कैसी हो?' -में  उद्देश्यपरक शिक्षा का हवाला देते हुये कहा है कि -''उद्देश्यपूर्ण शिक्षा के माध्यम से हमें सारे विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना हेतु विश्व के प्रत्येक बच्चे को विश्व-नागरिक बनाना है।" उन्हें समझाना है कि निजी कार्यों,राष्ट्रकार्यों में ही न लगे रहें बल्कि मानव जाति के उत्थान हेतु भी सोचना पड़ेगा।

इस प्रकार  अभिभावकों ,शिक्षकों के अतिरिक्त सरकार को भी यह चाहिये बालक को  उद्देश्यपरक,प्रभावी, चिंतनशील तथा सकारात्मक  शिक्षा प्रदान करने के हरसम्भव प्रयत्न करे।
                                       ✍️अनुजपण्डित

Sunday, March 6, 2022

महाभारत में रामायण का प्रभाव

वाल्मीकीय रामायण में महाभारत  की किञ्चित् छाया दिखाई नहीं पड़ती,जबकि महाभारत में रामायण के प्रभाव की बहुलता है। महाभारत के वनपर्व (292-99) में 'रामोपाख्यान' इसका प्रथम उदाहरण माना जा सकता है। द्रोणपर्व में रामायण का एक श्लोक है, जिसमें वाल्मीकि का नाम आया है-
अपि चायं पुरा गीत: श्लोको वाल्मीकिना भुवि।
                         - ( वा. रा. यु.का.81/28)
सम्पूर्ण रामायण पढ़ने से पता चलता है कि मात्र बाल और उत्तरकाण्ड में राम को विष्णु का अवतार दिखाया गया है, शेष समस्त रामायण में उन्हें एक आदर्श मानव के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जबकि महाभारत के रामोपाख्यान में उन्हें विष्णु का अवतार बताया गया है-
   तदर्थमवतीर्णोऽसौ   मन्नियोगाच्चतुर्भुज:।
   विष्णु: प्रहरतां श्रेष्ठ: स तत्कर्म करिष्यति।।
                         -(म. भा. वनपर्व 276/5)
 महाभारत में अन्यत्र राम से सम्बन्धित कई स्थलों को तीर्थ कहा गया है तथा हनुमान्-भीम संवाद में भीम को हनुमान् का उत्तरवर्ती बताया गया है। इसी संवाद में हनुमान् जी भीम को रामकथा भी सुनाते  हैं।
अतः उपर्युक्त तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि महाभारत के रचयिता को रामायण की जानकारी थी। किसी भी रचनाकार की रचना में उसके पूर्ववर्ती ग्रन्थों की छाया मिल ही जाती है। 
                             ✍️ अनुज पण्डित

Saturday, February 5, 2022

जनकल्याण एवं ज्ञान के प्रसार हेतु माँ सरस्वती से की प्रार्थना।

भारतीय सनातन संस्कृति सदा से ही प्रकृति और उसके संघटक देवताओं की स्तुति करती आ रही है। प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों का स्वागत करना भी हम भारतीयों की प्रवृत्ति रही है,इसीलिए माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को जब ऋतुराज वसन्त का आगमन होता है तो हम उसके भी स्वागत हेतु उद्यत हो उठते हैं। 

ऋतुओं में सबसे अधिक आनन्द प्रदान करने वाली वसन्त ऋतु एक नवीन सर्जना का मार्ग प्रशस्त करती है। रंग-बिरंगे पुष्प,नवीन पत्ते,हरियाली की चादर ओढ़े हुए धरती और खेतों में खिलखिलाती फसलें हमें यह संदेश देती हैं कि समाज में हर्ष एवं समृद्धि का विस्तार करने हेतु तैयार हो जायें! 
वसंतपंचमी का वैदिक,पौराणिक एवं वैज्ञानिक महत्त्व भी है जिसके कारण भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। षट्ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त पञ्चमी का वैदिक एवं  धार्मिक महत्त्व इसलिए है क्योंकि इसी दिन हिरण्यगर्भ प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि में शब्द एवं रस का संचार करने तथा समाज का कल्याण करने हेतु माँ वाग्देवी का प्राकट्य किया था। इसलिए बच्चों को अक्षरज्ञान कराने की शुरुआत इसी तिथि को ही की जाती है।

जब वसन्त का आगमन होता है तो शरद ऋतु में मन्द पड़ चुकी धरा की अग्नि एक नवीन सर्जना की ओर अग्रेषित होती है और समस्त चराचर जगत् पूरी ऊर्जा के साथ   सकारात्मक सर्जना की दिशा में यात्रा आरम्भ करता है।ऐसा माना जाता है कि सूर्य की अग्नि और मनुष्य की आंतरिक अग्नि का संतुलन काल है-वसन्त।

वसन्त पञ्चमी का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि त्रेता में श्रीराम जब वनवासावधि में थे तो माता शबरी के जूठे बेर इसी तिथि को ही खाये थे।ऐतिहासिक महत्त्व की बात करें तो मोहम्मद गोरी से पराजित होने के बाद पृथ्वीराज चौहान को जब अफगानिस्तान ले जाया गया तो यही वह तिथि थी जब पृथ्वीराज ने कुशलता से शब्दभेदी बाण चलाकर  मोहम्मद गोरी के प्राण हर लिए थे।

इस प्रकार वसन्त पञ्चमी का महत्त्व कई परिप्रेक्ष्यों में हमें समझने को मिलता है। मनुष्य,पशु-पक्षियों को तो यह ऋतु प्रिय है ही,  भगवान् को भी अत्यंत प्रिय है।तभी तो द्वापर में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि "ऋतुओं में मैं वसन्त हूँ।" 



सर्जनात्मक कार्य करने वाले,बौद्धिकवर्ग  एवं कलाप्रेमियों के लिए यह पर्व अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस दिन माता सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं हवन आदि  करके उनका जन्मोत्सव मनाते हैं तथा अपने ज्ञान,प्रतिभा और चिंतन में वृद्धि हेतु प्रार्थना करते हैं। जिसे भी शिक्षा,ज्ञान और भारतीयता से प्रेम होगा,वह निश्चित रूप से वसन्त पञ्चमी के दिन लोक कल्याण हेतु माँ वागीश्वरी की आराधना करता है।

लोक कल्याण एवं समाज में ज्ञान के प्रसार की कामना से युक्त होकर ही उत्तरप्रदेश के प्रयागराज जनपद में स्थापित नेहरू ग्राम भारती मानित विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा त्रिवेणी(संगम) क्षेत्र पर माँ सरस्वती का आराधन एवं हवन सम्पन्न किया गया,साथ ही समाज को यह संदेश दिया गया कि हम अपनी संस्कृति, पर्वों, एवं प्रकृति के महत्त्व को समझने का प्रयास करें तथा एक सकारात्मक एवं स्वस्थ मानसिकता वाले समाज का निर्माण करने हेतु सतत प्रयत्नशील रहें। 


                         ✍️ अनुज पण्डित

Sunday, January 23, 2022

तो यह थी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की महात्मा गांधी से नाराजगी की वजह!

🍂महात्मा गांधी ने अंग्रेजी सरकार से एक समझौता किया। इस समझौते के  तहत अंग्रेज सभी कैदियों को रिहा करने हेतु राजी हो गए किन्तु एक ऐसा क्रान्तिकारी था जिसे रिहा करने से अंग्रेजी सरकार ने साफ़ मना कर दिया। वह क्रांतिकारी कोई और नहीं बल्कि भारत माता के प्रिय सपूत "भगत सिंह" थे।

जिस समय यह समझौता हो रहा था,उस समय नेता जी सुभाषचन्द्र बोस जेल में थे।नेता जी की इच्छा थी कि गांधी जी इस समझौते को अस्वीकार कर दें। यदि रिहा करना है तो भगत सिंह को भी रिहा किया जाए किन्तु गांधी जी निर्णय ले चुके थे और अपनी बात से मुकरना नहीं चाहते थे,लिहाज़ा भगतसिंह और उनके साथियों  को छोड़कर सभी कैदियों को रिहा करने पर सहमति बन गयी।

परिणाम यह हुआ कि भगत सिंह को उनके साथियों सहित फाँसी दे दी गयी जिससे नेता जी को अत्यंत आहत हुए। इस घटना के बाद नेता जी गांधी और कांग्रेस से काफ़ी नाराज रहने लगे। नेता जी न सिर्फ़ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे बल्कि इस देश के रोल मॉडल भी हैं।

आज उनकी जयंती पर उन्हें सादर नमन💐🙏
                        ✍️ अनुज पण्डित

Wednesday, December 22, 2021

क्या सच में स्वभाव को बदलना असम्भव है?

निसर्ग,प्रकृति और स्वभाव - ये लगभग एक दूसरे के पर्याय हैं। पानी का स्वभाव  है-शीतलता, अग्नि का उष्णता और मधु का मधुरता। 

स्वभाव सहज होता है, प्राकृतिक होता है। कोई चाहकर भी इसे बदल नहीं सकता। यदि कोई व्यक्ति स्वभाव से ही क्रोधी है तो वह सदा क्रोध ही करेगा। जैसे- महर्षि दुर्वासा निसर्गत: क्रोधी थे। वे भले ही प्रयास करते रहे हों कि क्रोध न करें किन्तु रोक नहीं पाते थे।
ऐसा ही स्वभाव था लंकाधिपति रावण का। वह स्वयं ज्ञानी था,सबकुछ समझता था किंतु किसी के समक्ष न झुकना उसका मूल स्वभाव था। नाना माल्यवान उसे बहुत समझाते थे कि श्रीराम से बैर त्याग दो किन्तु रावण उनकी एक न सुनता था। एक दिन माल्यवान ने कहा कि-
"लंकेश! तुम इतने विद्वान् और समझदार होकर भी मेरी सिखावन को नहीं मानते! जबकि तुम ख़ुद भी जानते हो कि मैं ठीक कह रहा हूँ!"

इस पर रावण ने कहा कि-
"नानाश्री! मैं जानता हूँ कि आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, आपकी बात मेरे हित में है किंतु मैं क्या करूँ? मैं अपने स्वभाव से मजबूर हूँ और मेरा स्वभाव यह है कि भले ही मेरे शरीर के दो टुकड़े हो जायें किन्तु मैं किसी के सामने झुकूँगा नहीं।"

द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयं तु कस्यचित् ।

एष मे सहजो दोष: स्वभावो दुरतिक्रम:।।

                                - वा. रा.-6/36/11

रावण कहता है कि यह मेरा स्वाभाविक दोष है और स्वभाव को परिवर्तित नहीं किया जा सकता।


इसका एक दृष्टांत और भी सुनने को मिलता है कि कोई सन्त थे। उन्होंने देखा कि एक बिच्छू नदी में गिर गया है।वे उसे बचाने के उद्देश्य से निकालते हैं किंतु बिच्छू उन्हें डंक मार देता है, जिससे उनके हाथ से छूटकर बिच्छू पुनः पानी में गिर जाता है। उन्होंने बार-बार बिच्छू को बचाना चाहा किन्तु बिच्छू बार-बार उन्हें डंक मार देता। यह देखकर उनके शिष्य ने पूछा कि गुरुदेव! वह आपको बार-बार डंक मार रहा है फिर भी आप उसे बचाना क्यों चाहते हैं?

इस पर सन्त ने कहा कि-"बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है बचाना। हम दोनों अपना-अपना कार्य कर रहे हैं।"



स्वभाव हम हमारा गुण बन जाये तो हमें उच्चता देता है किंतु रावण की तरह दोष बन जाये तो हानि ही करवाएगा।
                         ✍️ अनुज पण्डित

ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत

🍂प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में ग्रहणों को लेकर प्रचलित पौराणिक धारणाओं के विपरीत, आर्यभट ( पञ्चमी शताब्दी के उत्तरार्ध से षष्ठी शताब्दी के...