Wednesday, December 22, 2021

क्या सच में स्वभाव को बदलना असम्भव है?

निसर्ग,प्रकृति और स्वभाव - ये लगभग एक दूसरे के पर्याय हैं। पानी का स्वभाव  है-शीतलता, अग्नि का उष्णता और मधु का मधुरता। 

स्वभाव सहज होता है, प्राकृतिक होता है। कोई चाहकर भी इसे बदल नहीं सकता। यदि कोई व्यक्ति स्वभाव से ही क्रोधी है तो वह सदा क्रोध ही करेगा। जैसे- महर्षि दुर्वासा निसर्गत: क्रोधी थे। वे भले ही प्रयास करते रहे हों कि क्रोध न करें किन्तु रोक नहीं पाते थे।
ऐसा ही स्वभाव था लंकाधिपति रावण का। वह स्वयं ज्ञानी था,सबकुछ समझता था किंतु किसी के समक्ष न झुकना उसका मूल स्वभाव था। नाना माल्यवान उसे बहुत समझाते थे कि श्रीराम से बैर त्याग दो किन्तु रावण उनकी एक न सुनता था। एक दिन माल्यवान ने कहा कि-
"लंकेश! तुम इतने विद्वान् और समझदार होकर भी मेरी सिखावन को नहीं मानते! जबकि तुम ख़ुद भी जानते हो कि मैं ठीक कह रहा हूँ!"

इस पर रावण ने कहा कि-
"नानाश्री! मैं जानता हूँ कि आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, आपकी बात मेरे हित में है किंतु मैं क्या करूँ? मैं अपने स्वभाव से मजबूर हूँ और मेरा स्वभाव यह है कि भले ही मेरे शरीर के दो टुकड़े हो जायें किन्तु मैं किसी के सामने झुकूँगा नहीं।"

द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयं तु कस्यचित् ।

एष मे सहजो दोष: स्वभावो दुरतिक्रम:।।

                                - वा. रा.-6/36/11

रावण कहता है कि यह मेरा स्वाभाविक दोष है और स्वभाव को परिवर्तित नहीं किया जा सकता।


इसका एक दृष्टांत और भी सुनने को मिलता है कि कोई सन्त थे। उन्होंने देखा कि एक बिच्छू नदी में गिर गया है।वे उसे बचाने के उद्देश्य से निकालते हैं किंतु बिच्छू उन्हें डंक मार देता है, जिससे उनके हाथ से छूटकर बिच्छू पुनः पानी में गिर जाता है। उन्होंने बार-बार बिच्छू को बचाना चाहा किन्तु बिच्छू बार-बार उन्हें डंक मार देता। यह देखकर उनके शिष्य ने पूछा कि गुरुदेव! वह आपको बार-बार डंक मार रहा है फिर भी आप उसे बचाना क्यों चाहते हैं?

इस पर सन्त ने कहा कि-"बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है बचाना। हम दोनों अपना-अपना कार्य कर रहे हैं।"



स्वभाव हम हमारा गुण बन जाये तो हमें उच्चता देता है किंतु रावण की तरह दोष बन जाये तो हानि ही करवाएगा।
                         ✍️ अनुज पण्डित

Monday, December 6, 2021

डॉ.मण्डलीक को मिला संस्कृत का 'विविध पुरस्कार'

संस्कृत-जगत् के मूर्धन्य विद्वान्,ज्योतिष रत्नाकर,निखिल भारतीय संस्कृत परिषद् के अध्यक्ष,आदरणीय गुरुदेव डॉ.अभिषेक कुमार त्रिपाठी 'मण्डलीक' जी किसी परिचय के मोहताज नहीं। 

प्रयागराज की पावन धरा पर पिछले दो दशकों से आप संस्कृत की सेवा करते हुए विभिन्न प्रतियोगी छात्रों को अपने ज्ञान से अभिसिंचित कर रहे हैं जिसके परिणाम स्वरूप आपके पढ़ाये हुए छात्र देश-प्रदेश के विभिन्न शैक्षणिक एवं प्रशासनिक पदों पर प्रतिष्ठित हैं।

संस्कृत के प्रति आपकी निष्ठा और रचनात्मकता की प्रशंसा करते हुए "उत्तर प्रदेश संस्कृतसंस्थान, लखनऊ" की विद्वत्सभा ने आपको, आपकी मौलिक कृति "स्त्रीप्रत्ययप्रयोगविमर्श" के लिए विविध-पुरस्कार  के अन्तर्गत  एकादश सहस्र रुपये का पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया है। इस महती उपलब्धि हेतु आपको अनन्त बधाईयाँ।


ध्यातव्य है कि आप वर्तमान में सरस्वती परमानंद सिन्हा इंटर कॉलेज, सरस्वतीपुर, प्रयागराज में प्रधानाचार्य पद पर सुशोभित हैं।

आपकी अन्य पुस्तकें जैसे-समासप्रयोगसमुच्चय, चिन्तनसरणि तथा दूतवाक्यम् आदि भी प्रकशित हो कर संस्कृत प्रेमियों को लाभान्वित कर रही हैं।

                                 ✍️ अनुज पण्डित

Thursday, October 7, 2021

धार्मिक एवं वैज्ञानिक आधार पर नवरात्र का महत्त्व

नौ दिन तथा नौ रातों तक मनाया जाने वाला नवरात्र उत्सव कब से मनाया जा रहा है? इसके पीछे  क्या कारण हैं? इन बातों पर चर्चा की जाए तो जो तथ्य उभरकर आते हैं, वे कुछ यों हैं-

त्रेताकाल में जब तत्समय के आतङ्कवादी लङ्कापति रावण से श्री राम का सङ्ग्राम छिड़ा था तो एक बार हुआ ऐसा कि श्री राम को पराजित होना पड़ा। पराजय के कारण राम को अतिशय ग्लानि और चिन्ता सता रही है। अपने स्वामी की ऐसी दशा परमभक्त हनुमान् से देखी न गयी,लिहाज़ा उनका भी चिन्तित होना लाज़िमी था। रावण से पराजित होने का क्या कारण है? इस बात पर चिन्तन चल ही रहा था कि तभी वहाँ परमपिता ब्रह्मा जी प्रकटे और यह बताया कि रावण की विजय का कारण है-उसका देवी-आराधन। अतः हे राम! आप भी एक सौ आठ कमल-पुष्पों से चण्डी की आराधना करें। 

उधर वीर हनुमान् अत्यधिक क्रोध के कारण यह ठान चुके थे कि मेरे रहते मेरे प्रभु चिन्तित रहें, यह मैं सहन नहीं कर सकता। मैं उनकी चिन्ता के कारण को ही समाप्त कर दूँगा। लङ्का और लङ्कापति ही क्या, मैं आज समस्त ब्रह्माण्ड को तहस-नहस कर दूँगा।अतः वे निकल पड़े संसार को नष्ट करने। उनका क्रोध इतना तीव्र था कि किसी के रोके नहीं रुक रहे थे। तब माता पार्वती ने अञ्जना का रूप धारण कर उनका क्रोध शान्त किया। 


शान्त होकर लौटे तो श्रीराम ने उनसे एक सौ आठ कमल-पुष्पों का इंतज़ाम करने को कहा। पुष्प उपलब्ध करवाकर हनुमान् जी ब्राह्मण-बालक के वेश में उस दल में सम्मिलित हो गए जिस दल के साथ रावण भी चण्डी का आराधन कर रहा था। हनुमान् की सेवा से प्रसन्न होकर पुरोहितों ने उनसे वर माँगने को कहा तो हनुमान् ने यह वर माँगा कि हे ऋत्विजों! मैं चाहता हूँ कि रावण के कल्याण हेतु   उच्चारित  किये जा रहे मन्त्र  का एव वर्ण बदल दीजिये, जिससे कि मन्त्र का अर्थ बदल जायेगा। पुरोहितों ने तथास्तु कहकर वैसा ही किया। परिणाम यह हुआ कि चण्डी क्रोधित हो गयीं और रावण की पूजा असफ़ल हुई। 

उधर श्रीराम देवी-मन्त्र का उच्चारण करते हुए एक-एक कमल समर्पित करते जा रहे थे तभी अचानक रावण की मायावी शक्ति से एक पुष्प विलुप्त हो गया। श्रीराम को लगा कि अब तो पूजा अधूरी रह जायेगी! तभी उन्हें स्मरण हुआ कि माता कौशिल्या मुझे राजीवलोचन कहकर पुकारा करती हैं अतः मैं अपनी आँख समर्पित कर दूँ तो एक कमलपुष्प की कमी पूरी हो जाएगी।


राम ने जैसे ही तूणीर से बाण निकालकर अपनी आँख निकालनी चाही,वैसे ही देवी का प्राकट्य हुआ और उन्होंने राम को ऐसा करने  से रोका। राम को विजय का वरदान मिला। तभी से नवरात्र-उत्सव का आरम्भ माना जाता है।
यह तो हुआ धार्मिक कारण। अब बात करते हैं वैज्ञानिक कारण की । आज आवश्यकता है कि हम अपनी मान्यताओं,परम्पराओं एवं पौराणिक कथाओं को वैज्ञानिकता से जोड़कर देखें और इनका महत्त्व नवपीढ़ी को समझायें तभी आज के भौतिकतावादी युग में इनका महत्त्व एवं उपयोगिता समझी जा सकती है।

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक कारण यह है कि  यह समय ऋतु सन्धि का समय होता है अर्थात् एक ऋतु का गमन और दूसरी का आगमन। इस सन्धिकाल में सङ्क्रामक और महामारी जैसे रोगों की अधिक सम्भावना रहती है, अस्तु हमारे मनीषियों ने नवरात्र के माध्यम से शरीर-तन्त्र को शुद्ध करने का प्रयास किया। शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्गों की सफाई के लिए सात्त्विक आहार लिया जाता है। व्रत के कारण शरीर,मन, बुद्धि स्वच्छ होते हैं। शुद्धा बुद्धि होगी तभी तो उत्तम विचार उपजेंगे और तभी आप उत्तम कर्मों को करने हेतु उद्यत होंगे। इससे आपकी सच्चरित्रता में वृद्धि होती है।


 सवाल यह उठता है कि इस उत्सव का नाम नवरात्र क्यों पड़ा? नवदिन क्यों नहीं? शिवरात्रि क्यों? शिवदिन क्यों नहीं?  इसका अर्थ यही है कि रात्रि का कोई न कोई रहस्यमयी विशेषता अवश्य है! हमारे पूर्वज मनीषियों को विदित था कि रात्रि में प्रकृति के तमाम अवरोध समाप्त हो जाते हैं आप स्वयं विचार कीजिये कि यदि दिन में आवाज दी जाए तो उसकी पहुँच बहुत दूर तक नहीं होगी किन्तु रात्रिकालीन आवाज दूरगामी होती है।वैज्ञानिक तथ्य यह कहता है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की और रेडियो की तरङ्गों को रोक देता है।ठीक इसी प्रकार दिन में किये गए मन्त्र-जाप की तरङ्गों में रुकावट पैदा होती है,इसीलिए दिन की अपेक्षा रात्रि का महत्त्व अधिक है। मन्त्रों की तरङ्गें, घण्टा एवं शङ्ख की तरङ्गें वातावरण में व्याप्त कीटाणुओं को नष्ट करने में कारगर होती हैं। 

इस प्रकार नवरात्र-उत्सव विजय,उत्साह और शक्ति का प्रतीक है। उत्तम स्वास्थ्य एवं मानसिक शांति प्रदान करने वाला है। व्रत,उपासना,यज्ञादि कर्म करने से सात्त्विकता आती है, कुत्सित विचारों से छुटकारा मिलता है तथा समाज में अपराध एवं अनैतिक घटनाएँ घटित होने की सम्भावनाएँ कम हो जाती हैं।

#फ़ोटो साभार गूगल

                          ✍️ अनुज पण्डित

                       

Sunday, October 3, 2021

द्रोणवध के बाद का एक प्रसङ्ग और कर्ण-अश्वत्थामा विवाद

द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने गुरु द्रोण को बाल पकड़कर घसीटा,उनका शिरच्छेदन करके परलोक भेज दिया। द्रोण का सारथि अश्वसेन भागता हुआ अश्वत्थामा के पास आता है और सारी कहानी बताता है । अश्वत्थामा को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि परशुराम से शिक्षा प्राप्त किये हुए, तीनों लोकों के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी मेरे पिता अब इस धरती पर नहीं रहे! 


सारथि ने बताया कि सत्यवादी पृथापुत्र युधिष्ठिर ने तीव्र स्वर में कहा कि -'अश्वत्थामा मारा गया'.... शेष वाक्यांश 'हाथी' को दबे स्वर में उच्चारा। युधिष्ठिर की बात पर पूर्ण विश्वास करके आपके तात अस्त्र-शस्त्र छोड़कर अश्रुपात करने लगे। पुत्र-वियोग में वे इतने अधीर हो गए कि उन्हें अपने देह की भी सुध न रही। इसी अवसर का लाभ उठाकर धृष्टद्युम्न ने बेरहमी से उन्हें मृत्यु को सौंप दिया।
अश्वत्थामा पिता की मृत्यु से उपजे शोक को बर्दाश्त न कर सका और स्वयं प्राण छोड़ने की ठान  ली। अश्वसेन और आचार्य कृप उसे समझाते हैं कि आप जैसे प्रचण्ड वीर को इस तरह की कातरता शोभा नहीं देती।  कृपाचार्य खिन्नता प्रकट करते हुए कहते हैं कि निःशस्त्र आचार्य द्रोण की ऐसी दर्दनाक दशा देखने वाले तथा कुरुसभा में द्रौपदी का मानमर्दन देखने वाले तथाकथित शूरवीरों को धिक्कार है। 

केश पकड़कर घसीटने की दो-दो घटनाएँ घटित हो गयीं, जिनमें से पहली का परिणाम तो महाभारत-सङ्ग्राम बनकर सामने ही खड़ा है, अब दूसरी घटना से उपजे,  अश्वत्थामा के क्रोध से इस विनाश को भला कौन बचाएगा!

अश्वत्थामा क्रोध में आकर कहता है-
"उस दुष्ट धृष्टद्युम्न ने , जीते जी मेरे पिता के शिर का स्पर्श नहीं किया बल्कि मेरे शिर पर पैर रखा है।" वह सारथि को रथ लाने का आदेश देता है और कहता है कि उन सबको मौत के मुँह में भेजूँगा जो मेरे पिता की नृशंस हत्या के मूकदर्शक बने रहे। जिस प्रकार सहस्रबाहु द्वारा पिता के शिर का स्पर्श करने के परिणामस्वरूप परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश किया, उसी प्रकार यह अश्वत्थामा भी आज शत्रुओं के शोणित से पितृतर्पण करेगा।

कृपाचार्य उसे समझाते हैं कि निश्चय ही आपमें प्रतिकार लेने की क्षमता है किंतु इस तरह से नहीं। हम सब आपको सेनापति-पद पर सुशोभित करके समरांगण में उतारना चाहते हैं क्योंकि गंगापुत्र और  द्रोणहीन कौरव सेना वास्तव में सेना न हो सकेगी!

अश्वत्थामा मान जाता है और कृप के साथ वहाँ जाता है जहाँ मित्र कर्ण संग दुर्योधन बैठा था। अश्वत्थामा को सान्त्वना प्रदान करते हुए दुर्योधन कहता है कि "मनुष्य अपने स्वभाव को बड़ी कठिनता से छोड़ पाता है, यही कारण है कि शोकान्ध आचार्य द्रोण ने क्षत्रिय धर्मोचित कर्कशता को छोड़कर ब्राह्मण-सुलभ दीनता को अपना लिया।"

इतने में कर्ण बोल पड़ता है कि हे मित्र! वास्तव में बात ऐसी नहीं है बल्कि यह है कि गुरु द्रोण अपने पुत्र को भूपति के पद पर देखना चाहते थे।अब जब उन्होंने सुना कि अश्वत्थामा रहा ही नहीं तो किस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मैं शस्त्र-धारण करूँ! बस यही कारण था कि उन्होनें शस्त्र-त्याग कर दिया। दुर्योधन कर्ण की बात पर सहमति देता है। कर्ण आगे कहता है कि बचपन से ही इनके अभिप्राय को द्रुपद जानता था तभी तो अपने राज्य में इन्हें ठहरने नहीं दिया।

कृपाचार्य, अश्वत्थामा को सेनापति बनाये जाने की राय दुर्योधन को देते हैं किंतु दुर्योधन यह कहकर टाल देता है कि यह पद तो अंगराज के लिए निश्चित् किया जा चुका है!  अश्वत्थामा कहता है कि हे कौरवेश्वर! क्या अब भी कुछ विचार करने योग्य रह गया है? आज संसार पाण्डवशून्य तथा केशवहीन हो जाएगा,आज बाहुवीरों की युद्ध कथा समाप्त हो जाएगी।


अश्वत्थामा की इस बात पर कर्ण को हँसी आ जाती है और वह कहता है कि हे द्रोणपुत्र! यह कहना आसान है,कर पाना कठिन। आपके अतिरिक्त और भी वीर कौरवदल में हैं जो यह कर सकते हैं किंतु सम्भव कहाँ हो पा रहा है! अरे मूर्ख! दुःखी व्यक्ति  मात्र आँसू बहा सकता है, युद्ध में कूद नहीं सकता।

कर्ण की इस तीखी बात को सुनकर अश्वत्थामा क्रोध से भर जाता है और प्रत्युत्तर में कहता है-
"अरे नीच! राधा-गर्भ का बोझ!नीच सूत! मैं तुम्हारे जैसा कायर नहीं कि युद्ध छोड़कर भाग आऊँ।मेरे आयुध तेरे आयुधों की तरह गुरुशाप के कारण निस्तेज नहीं।
कर्ण पलटवार करते हुए-
"अरे वाचाट! मैं बलहीन हूँ अथवा बलयुक्त, कम से कम तुम्हारे पिता के समान डरकर आयुधों का परित्याग तो नहीं किया!"

"मैं सूतपुत्र हूँ अथवा जो कुछ भी हूँ..! कुल में जन्म होना भाग्य के अधीन है, पौरुष तो मुझपर ही निर्भर है!"
राधेय और अश्वत्थामा का विवाद इस कदर बढ़ जाता है कि अश्वत्थामा यह चुनौती तक दे डालता है कि रे राधेय! बाहुबल के अभिमान से फूले तेरे शिर पर मैं यह बायाँ पैर मार रहा हूँ,इसे रोककर दिखाओ।
 

कृपाचार्य और दुर्योधन दोनों को पकड़ते हैं और शांत रहने को कहते हैं। कर्ण क्रोध में कहता है कि अरे नीच ब्राह्मण! जाति से तू नितांत अवध्य है किन्तु इस मुझ पर प्रहार करने के उद्देश्य से उठाई हुई तुम्हारी इस लात को तुम खड्ग से कटी हुई,भूमि पर पड़ी देखोगे।


अश्वत्थामा के क्रोध का पारावार चढ़ जाता है और कहता है कि "यदि जाति के कारण मैं अवध्य हूँ तो यह लो,मैं अपना यज्ञोपवीत तोड़ देता हूँ,छोड़ दी मैंने अपनी जाति। अब अर्जुन की तुझे मारने की प्रतिज्ञा झूठी करनी होगी मुझे क्योंकि तेरा वध मेरे हाथों होना सुनिश्चित हो चुका है। अब या तो शस्त्र उठाओ या फिर क्षमा-याचना करो।"

दोनों एक-दूसरे पर प्रहार करने को उद्यत होते हैं किंतु कृपाचार्य और दुर्योधन बीच-बचाव कर देते हैं।

                     ✍️ अनुज पण्डित

Sunday, September 12, 2021

कठोपनिषद्-संक्षिप्त कथा

#उपनिषच्चर्चा_भाग_8

                     कठोपनिषद्

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कृष्णयजुर्वेद की कठ शाखा से सम्बद्ध यह उपनिषद् प्रमुख उपनिषदों में गिना जाता है। तपस्वी आचार्य  "कठ" इसके प्रणयनकर्त्ता हैं, जो वैशम्पायन मुनि के शिष्य रहे। दो अध्यायों (प्रत्येक अध्याय में तीन वल्लियाँ) में निबद्ध इस उपनिषद् में काव्यात्मक मनोरम शैली में गूढ दार्शनिक तत्त्वों का विवेचन है। इसमें वर्णित यम-नचिकेता की कथा अत्यंत रोचक एवं ज्ञानवर्द्धक है।

संक्षिप्त कथा- उद्दालक ऋषि के पुत्र वाजश्रवस ने सर्वमेध या विश्ववेदस नामक यज्ञ किया। इस यज्ञ का अर्थ होता है कि जातक अपनी सर्वसम्पत्ति को दान कर देता है। यज्ञ सम्पन्न हो जाने पर वाजश्रवस ऋत्विजों (पुरोहितों) को दक्षिणा में वृद्ध और कमजोर गायें प्रदान कर रहे थे। यह देखकर वाजश्रवस का पुत्र  "नचिकेता" सोच में पड़ गया। उसने सोचा कि ये गायें तो अत्यंत जर्जर हैं! वे न तो दुग्धदोहा हैं और न ही उनमें अब प्रजजन-शक्ति शेष है! इस प्रकार की गायें दान करने का अर्थ है-दूसरों पर भार लादना। इससे तो पुण्य के स्थान पर पाप ही लगेगा!

इस प्रकार विचार करने के अनन्तर नचिकेता ने पिता से कहा कि हे तात! इससे अच्छा तो आप मुझे ही दान कर देते! बताइये,आप! मुझे किसे देंगे? पिता ने बालक की बात को गम्भीरता से नहीं लिया किन्तु नचिकेता ने बार-बार वही प्रश्न दोहराया कि मुझे किसे देंगे? इस पर क्रोधित होकर वाजश्रवस ने कहा कि -

"मैं तुझे मृत्यु को देता हूँ।" मृत्यु अर्थात् यमराज। 


पिता की आज्ञा-पालन हेतु नचिकेता सीधा यमलोक पहुँचा किन्तु यमराज अनुपस्थित थे। नचिकेता ने उनके आने की प्रतीक्षा में तीन दिन बिना कुछ खाये-पिये व्यतीत कर दिया। जब यम वापस आये तो नचिकेता को देखकर आश्चर्यचकित हुए और अतिथि सत्कार में उपेक्षा के प्रायश्चित् के रूप में नचिकेता से तीन वर माँगने को कहा।

नचिकेता ने तीन वरदान माँगे-

1- मेरे यमलोक से लौटने पर मेरे पिता मुझे पहचान लें और प्रसन्न हों।
2-दिव्य अग्निविद्या का ज्ञान
3-जीवन और मृत्यु का रहस्य
यमराज ने आरम्भ के दो वरदान नचिकेता को दे दिया। दूसरे वरदान में यम ने नचिकेता को अग्निविद्या का ज्ञान दिया और उसकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से अग्निविद्या का विवरण पूछा तो नचिकेता ने अक्षरशः उसे दोहरा दिया। नचिकेता की स्मरणशक्ति और प्रतिभा देखकर  प्रसन्न यम ने कहा कि आज से यह अग्निविद्या तुम्हारे नाम से जानी जाएगी। और इस प्रकार नाम पड़ा-"नचिकेताग्नि।" 
दूसरे वरदान तक तो यमराज ने आपत्ति नहीं प्रकट की किन्तु तीसरे वरदान को देने से मना कर दिया। यमराज ने समझाया कि यह अत्यंत गूढ विषय है।इसके स्थान पर तुम संसार का सारा वैभव और साम्राज्य माँग लो किन्तु यह मत पूछो कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का क्या होता है! यह विषय अत्यंत कठिन और अगम्य है।  यम ने अनेक प्रलोभन दिए किन्तु नचिकेता  अपने वरदान पर अड़ा रहा। 
उसका हठ देखकर यम ने कहा ठीक है, सुनो!

"न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।

अजो नित्यं शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।" -1/2/18


"एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते।

दृश्यते त्वग्रर्य्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।"- 1/3/12

                       ✍️अनुजपण्डित
फ़ोटो साभार गूगल

Saturday, August 14, 2021

भारत विभाजन:बीसवीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदी

इतिहास के पन्नों पर खूनी स्याही से अंकित आज की तारीख़ 14 अगस्त  हमेशा एक ऐसा घाव बनकर रहेगी जो कभी भर नहीं सकेगा। यह वह तारीख़ है जिसने सिर्फ़ भारत की जमीन के ही दो टुकड़े नहीं किये  बल्कि यह वह दिन है जिसने हमारे दिलों को,रिश्तों को,परिवारों को तथा भावनाओं को बाँट कर रख दिया था। 

इस तारीख़ ने भारत का बंटवारा दो तरह से किया। एक तो पाकिस्तान बनाकर और दूसरा बंगाल के पूर्वी हिस्से को भारत से अलग करके उसे पूर्वी पाकिस्तान में तब्दील कर दिया था,जो बाद में बांग्लादेश बना। हाँ, यही बांग्लादेश जहाँ आज तालिबानियों ने कब्ज़ा कर रखा है।

इतिहास की किताबें उठाकर पढ़िए तो 1947 में इस तिथि को हुए बंटवारे के मुख्य कारण अंग्रेज़ों की षड्यन्त्रकारी नीति एवं मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिकता वाली नीति थी। 

कांग्रेस हिन्दू संस्था थी,यह तो मुझे नहीं पता किन्तु अंग्रेज इसे हिन्दू संस्था कहकर ही मुस्लिम लीग को भड़का रहे थे। इस भड़काव के चलते ही मुसलमानों ने एक स्वतंत्र राष्ट्र की चाहत पाल ली लिहाजा 14 अगस्त 1947 को एक नया राष्ट्र पैदा हुआ-पाकिस्तान। नया राष्ट्र तो बन गया किन्तु दोनों देशों के बीच की सीमा तय करना टेढ़ी खीर थी। इस सीमा तो तय करने में 17 अगस्त तक का समय लग गया। 

17 अगस्त को सीरिल रेडक्लिफ ने दोनों देशों के बीच एक रेखा खींच दी और इस प्रकार खड़ी हो गयी हिन्दू-मुस्लिम-विवाद की दीवार। यह ऐसी मजबूत दीवार है जो शायद कभी ढह न सकेगी और इस विवाद का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता रहेगा ।


भारत विभाजन बीसवीं सदी की एक सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में याद किया जाता रहेगा। इस तारीख और घटना को प्रत्येक भारतीय को जानना चाहिये क्योंकि बंटवारे के वक्त जो खूनी खेल हुआ था उसे याद करके दिल दहल जाता है। जिन लोगों ने एक साथ आजादी का सपना देखा वे ही एक- दूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे थे। 

अंग्रेज तो चले गए किन्तु जाते-जाते वे हमारे देश को एक लकीर दे गए। कौन जानता था कि जिस आजादी के लिए इतने संघर्ष किये,इतनी लड़ाइयाँ लड़ीं वह आजादी मिलेगी तो इस तरह ! किसी को नहीं पता था कि आजादी की कीमत यह विभाजन रेखा होगी। 


इस एक लकीर की वजह से दुनिया ने सबसे बड़ा विस्थापन देखा। पूरे लगभग 1.45 करोड़ हिन्दू विस्थापित हुए।
#फ़ोटो साभार गूगल
                           ✍️ अनुज पण्डित

Monday, July 19, 2021

धर्म के लिए बगावत करना भी धर्म है

यूँ तो कई नाम स्वतंत्रता सेनानी कहलाते हैं किंतु एक नाम जो धार्मिक मान्यताओं से ओतप्रोत था,भारतीय संस्कृति का संवाहक था और अपनी नौकरी से ज्यादा अपने धर्म को तवज्जो देता था,वह है  "मंगलपाण्डेय।"  बंदूक टांगने की नौकरी करने वाले इस वीर ने बंदूक की ही वजह से बगावत कर दी। चर्बीयुक्त कारतूसों को मुँह से लगाना इस सिपाही को रास नहीं आया, उसकी आत्मा ने कहा कि तुम यदि ऐसा करोगे तो धर्म से भ्रष्ट हो जाओगे।

मंगलपाण्डेय ने जब सिपाही की नौकरी की थी तो उस समय  "ब्राउन बैस"  बंदूक उपयोग में लायी जाती थीं,कई सालों से सैनिक इन्हीं बंदूकों का उपयोग करते आ रहे थे किंतु जब समय के साथ नई बंदूकें आयीं तो उनमें गोली भरने का काम भी नए तरीके से होने लगा। नई बंदूक का नाम था  "एनफील्ड।" इस बंदूक में जो कारतूस भरी जाती थीं उनका बाहरी आवरण चर्बी का बना होता था। यह चर्बी गाय और सुअर की रहती थी। सैनिकों को मुँह से काटकर बाहरी आवरण हटाना पड़ता था। बस यही बात मंगलपाण्डेय को खटक गयी और उन्होंने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया और बगावत कर डाली। 

मंगलपाण्डेय की बगावत में साथी सिपाही भी शामिल थे क्योंकि उन्हें भी चर्बीयुक्त कारतूस मुँह से लगाना पसन्द नहीं था।अंग्रेजों ने कहा कि मंगलपाण्डेय धार्मिक पागलपन के शिकार हो गए हैं।

 मेरे विचार से यदि धर्म पर आँच न आने देना पागलपन है तो यही सही। धर्म के ख़ातिर यदि बगावत करनी पड़े तो मंजूर है। जिस गाय को भारतीय सनातन संस्कृति में पूज्या माना गया है, उसी की चर्बी को मुँह से लगाना भला कैसे सम्भव हो सकता है!

मंगलपाण्डेय ने बैरकपुर छावनी से विद्रोह का बिगुल बजाया। इन्हें गिरफ्तार करने के लिए भारतीय सिपाहियों को आदेश दिया गया किन्तु कोई भी सिपाही ऐसा करने की हिम्मत न जुटा सका था। अंततः 6 अप्रैल 1857 को उत्तरप्रदेश के बलिया जनपद में जन्मे मंगलपाण्डेय का कोर्ट मार्शल कर 8 अप्रैल को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह की तरह इस सेनानी को भी समय से दश दिन पहले फाँसी पर लटका दिया गया था किन्तु विद्रोह की आग अभी बुझी नहीं थी।  एक माह बाद मेरठ की छावनी पर बगावत हो गयी। 

इस बगावत से अंग्रेज समझ चुके थे कि हिंदुस्तान में ज्यादा दिन तक हुकूमत चलाना अब सम्भव न होगा । इस बगावत से परेशान होकर अँग्रेजी शासन ने हिंदुस्तान की जनता पर इतने अधिक कानून थोप दिए कि कोई भी सैनिक ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ भविष्य में आवाज न उठा सके। 

आज भी वीर मंगलपाण्डेय जैसे लोगों की आवश्यकता है किन्तु लोकतंत्र में संविधान इस तरह की बगावत की इजाज़त नहीं देगा। बगावत करोगे तो बागी कहलाओगे जबकि वास्तव में ऐसे गलत के ख़िलाफ़ आवाज उठाने वाले को नायक का दर्जा दिया जाने चाहिए! 

आज यदि बगावत की जाए तो बागियों की भरमार हो जाये क्योंकि हर क्षेत्र में गलत काम हो रहे हैं। धार्मिक आस्था-मान्यताएँ गल रही हैं, सारे विभाग भ्रष्टाचार में निमग्न हैं और राजनेता देश को बेचने पर उतारू हैं। क्रांति और विद्रोह की जरूरत आज अधिक है देश को क्योंकि देश उस दिशा में जा रहा है जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ अराजकता, भ्रष्टाचार,आतंकवाद और बेईमानी चालू है। 

#फ़ोटो साभार गूगल
                           ✍️ अनुज पण्डित

ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत

🍂प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में ग्रहणों को लेकर प्रचलित पौराणिक धारणाओं के विपरीत, आर्यभट ( पञ्चमी शताब्दी के उत्तरार्ध से षष्ठी शताब्दी के...