Tuesday, March 3, 2026
ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत
Wednesday, May 28, 2025
लालू यादव ने पोते का नाम 'इराज' रखा।क्या आप जानते हैं इस शब्द का अर्थ? आइए देखते हैं👇
लालू यादव ने अपने पोते का नाम 'इराज' रखा है। देखने सुनने में यह एक इस्लामिक शब्द प्रतीत होता है, खासकर उन लोगों को जिन्हें शब्दों का ठीक-ठाक ज्ञान नहीं है। दरअसल 'इरा' संस्कृत भाषा का शब्द है। वैय्याकरणों को विदित होगा कि 'इरा' शब्द स्त्रीलिंग है जिसका अर्थ सुरा(मदिरा),भूमि आदि है। व्युत्पत्ति के तौर पर देखें तो स्त्रीलिंग की विवक्षा में इ धातु में रन् तथा टाप् प्रत्यय जोड़ने से इरा शब्द निष्पन्न होता है। कहीं-कहीं पुल्लिंग की विवक्षा में भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है।
इरा शब्द पर टिप्पणी से पूर्व इला पर टिप्पणी का पठन उपयोगी होगा। वैदिक निघण्टु में इरा का वर्गीकरण अन्न नामों के अन्तर्गत किया गया है। जैमिनीय ब्राह्मण २.४१२ तथा तैत्तिरीय संहिता ७.५.९.१ का कथन है कि यज्ञ विशेष में एक दिन के यज्ञ की समाप्ति इलान्त साम द्वारा करके ही प्रजापति ने प्रजा के लिए अन्नों में सर्वश्रेष्ठ अन्न इरा प्रदान किया। इसका तात्पर्य होगा कि अचेतन मन के स्तर पर इला रूपी आनन्द का विकास पूर्ण होने पर ही इरा का विकास आरम्भ होता है। इला शब्द में ल पृथिवी तत्त्व का, स्थिरता का सूचक है जबकि इरा में र अक्षर अग्नि का, गति का सूचक है। ऋग्वेद ५.८३.४ के अनुसार जब पृथिवी पर पर्जन्य वृष्टि होती है तो विश्व में इरा उत्पन्न हो जाती है(ओषधि-वनस्पतियों को भी इरा कहते हैं)। तैत्तिरीय संहिता २.६.७.२ से संकेत मिलता है कि यदि यज्ञीय इडा, इडा की पकी हुई अवस्था को प्राप्त करना है तो इरा को बृहद् रूप देकर उसे द्युलोक में स्थापित करना पडेगा। इसके पश्चात् इरा गौ बन कर पृथिवी पर, मन के स्तर पर इडा गौ पशु के रूप में अवतरित होगी जिसके पद-पद से घृत की सृष्टि होगी। इस प्रकार इडा और इरा का विकास एक दूसरे पर आश्रित है।
पुराणों में इरा को काश्यप की तथा पुलह की पत्नी कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.५ में इरा को विश्वसृजों/देवताओं की पत्नी कहा गया है। बौधायन श्रौत सूत्र १७.१९.१ में विश्वसृज सत्र के वर्णन में इरा को तप नामक गृहपति की पत्नी कहा गया है।अन्यत्र इडा की तुलना दिति से और इन्द्राणी/शची की तुलना अदिति से की गई है(अथर्ववेद १५.६.२०)। अतः यह संभव है कि इरा की स्थिति दिति और अदिति के बीच की हो।
विभिन्न भाषाओं में इरा शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में हुआ है। वहाँ इस शब्द का प्रयोग सतर्क,समर्पित तथा शक्तिशाली आदि अर्थों में किया गया है। बाइबिल में इरा किंग डेविड का पुजारी है।
बहरहाल.. यह तो हुई इरा शब्द की बात। अब बात करते हैं-इराज शब्द की,तो इरा से उत्पन्न होने वाला 'इराज' कहलाता है। अब आप इसका अर्थ अपने अनुसार-भूमि से उत्पन्न, सुरा से उत्पन्न या शक्तिशाली से उत्पन्न लगा सकते हैं।
इस प्रकार लालू यादव को यह कहकर कि उन्होंने इस्लामिक नाम रखा, ट्रोल करना उचित नहीं। हाँ, बाकी मुद्दों पर तो ट्रोल होने के हकदार वे हैं ही! हम अपनी भाषा तथा ग्रन्थों के शब्द जानकारी के अभाव में अन्य सम्प्रदाय के पाले में न फेकें।
✍️ डॉ. अनुज पण्डित
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विश्व पुस्तक दिवस पर खरी-खरी बात
ऐसा माना जाता है कि अपने समय के कालिदास कहे जाने वाले विलियम शेक्सपीअर के निधन-दिवस पर प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को विश्व-पुस्तक दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को ने मनुष्य को पुस्तकों के समीप लाने के लिये वर्ष 1995 में इस दिवस की शुरुआत की ।
हालाँकि जब तक इंटरनेट की दुनिया में व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी की स्थापना नहीं हुयी थी तब तक मजबूरीवश कुछ विद्यार्थी ईंट-बालू-पत्थर निर्मित कक्षाओं में बैठकर शिक्षक और पुस्तकों को तवज्जो देते थे किन्तु जब से ब्रह्माण्डीय ज्ञान कंप्यूटर, मोबाइल और टेलिविज़न पर अवतरित हुआ है तब से विद्यार्थी और पुस्तकों का रिश्ता तलाक की कगार पर आ पहुँचा है।
सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि आज की अधिकांश युवा पीढ़ी पढ़ाई-लिखाई को गम्भीरता से लेती ही नहीं। बहुतेरे युवा-युवतियाँ किताबों से मुँह फेरकर चंद लाइक्स और फॉलोवर्स की कामना बलवती किये हुये सोशल साइट्स पर अंग-प्रदर्शन और अश्लीलता के परीक्षा की होड़ में जुट जाते हैं कि काश इस परीक्षा में सबसे अव्वल होकर हम उन्नति के शिखर पर विराजमान हो सकें!
"इश्क़ कर लो किताबों से बेइन्तहां।
एक ये ही हैं जो,अपनी बातों से पलटा नहीं करतीं।"
आइये जानते हैं "परशुराम" से जुड़ी ख़ास जनाकारी
Wednesday, April 19, 2023
सीता स्वयम्बर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
आख़िर विश्वामित्र ने राम को आज्ञा देने में क्यों बिलम्ब किया ? जनक का परिताप, लक्ष्मण का क्रोध क्यों वे देखे जा रहे थे?क्या कोई और शूरवीर अपना बाहुबल आजमाने को शेष रह गया था या फिर कोई और बात थी जो मात्र विश्वामित्र ही जानते थे? इन्हीं समस्त जिज्ञासाओं के समाधान हेतु पढ़िये मेरा यह लेख👇
सभा मे सन्नाटा पसर गया, षड्विकारों से रहित विदेहराज को भी अपार क्रोध चढ़ा। उन्होनें दरबार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की ओर नजर घुमाकर,वीरप्रसूता पृथ्वी को वीरविहीन तक कह डाला! अब सब यह मान बैठे थे कि सीता के योग्य कोई पुरुष है ही नहीं। उन्हें क्या पता कि इसी सभा में पुरुषोत्तम राम भी बैठे हैं। बाकी राजा तालाब हैं तो राम समुद्र और सीता जैसी महानदी समुद्र को छोड़कर भला कहाँ मिलेगी!
मानसकार लिखते हैं-"विस्वामित्र समय सुभ जानी।बोले अति सनेहमय बानी।।उठहु राम भंजहु भव चापा। मेटहु तात जनक परितापा।।" -इन चौपाइयों को पढ़कर आपके मस्तिष्क में भी प्रश्न कौंध गया होगा कि विश्वामित्र को कैसे पता कि अब धनुषभंग करने का शुभ समय है! इसका जवाब हो सकता है कि विश्वामित्र नक्षत्र और मुहूर्त के ज्ञाता थे लेकिन जब समस्त प्रतिभागी अपना बाहुबल आजमा रहे थे,तब क्या समय अशुभ था! बाबा तुलसी आगे फिर लिखते हैं -"लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े।काहुँ न लखा देखु सब ठाढ़े।।" अर्थात् श्री राम ने धनुष को कब हाथ में लिया,कब प्रत्यंचा चढ़ायी और कब तोड़ दिया,यह किसी ने नहीं देखा। राम फुर्तीले हो सकते हैं किन्तु विश्वामित्र और राम को इतनी क्या जल्दी थी कि पल भर में धनुष को भंग कर दिया!
जैसे ही शनि ने धनुष से अपना प्रभाव अलग किया, वैसे ही विश्वामित्र ने तत्काल राम को आज्ञा दी कि हे राम!उठो,जाओ और तुरन्त धनुष भंग करो क्योंकि उन्हें आशंका थी कि यह शनि पुनः धनुष पर अपना प्रभाव जमा सकता है। इसीलिए बाबा तुलसी कहते हैं कि राम को धनुष उठाते और भंग करते हुए पल भर का भी समय नहीं लगा।
Thursday, March 30, 2023
गंगापुत्र का "मात्स्यन्याय" (लॉजिक ऑफ फिश)
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