Tuesday, March 3, 2026

ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत

🍂प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में ग्रहणों को लेकर प्रचलित पौराणिक धारणाओं के विपरीत, आर्यभट ( पञ्चमी शताब्दी के उत्तरार्ध से षष्ठी शताब्दी के मध्य तक ) ने सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की।  उनकी अवधारणाएँ आधुनिक खगोल विज्ञान से पूर्णतः संगत हैं। एतदतिरिक्त यह लेख समकालीन भारतीय समाज में व्याप्त ग्रहण-सम्बन्धी अंधविश्वासों की आलोचनात्मक समीक्षा भी करता है। ग्रहण सदियों से मानव सभ्यता हेतु जिज्ञासा तथा भय का विषय रहे हैं। विश्व की अनेक संस्कृतियों में इन्हें दैवी या दानवी शक्तियों से सम्बद्ध किया गया। भारत में भी राहु-केतु संबंधी पौराणिक मिथक दीर्घकाल तक ग्रहण की व्याख्या का आधार रहे। किंतु 5वीं–6वीं शताब्दी में आर्यभट ने इन मान्यताओं को अस्वीकार कर ग्रहणों को एक खगोलीय एवं गणितीय परिघटना के रूप में परिभाषित किया।

आर्यभट का प्रमुख ग्रंथ आर्यभटीयम्  ( अनुमानत: 499 ईस्वी में प्रणीत) भारतीय खगोल विज्ञान का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। इसके गोलपाद में ग्रहों की गति, पृथ्वी की छाया तथा सूर्य-चंद्र संबंधों का स्पष्ट विवेचन प्राप्त होता है। आर्यभट के अनुसार ग्रहण किसी दैत्य द्वारा ग्रहों को निगलने की घटना नहीं है, अपितु यह सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की सापेक्ष स्थिति से उत्पन्न होने वाली छाया-परिघटना है। आर्यभट का प्रसिद्ध श्लोक उल्लेख करता है- "छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूच्छाया ॥" (आर्यभटीयम्, गोलपाद 4/37) अर्थात् जब चंद्रमा सूर्य तथा पृथ्वी के मध्य आकर सूर्य को आच्छादित करता है, तो उस स्थिति को सूर्यग्रहण कहते हैं तथा जब पृथ्वी की विशाल छाया चंद्रमा पर पड़ती है,तो ऐसी स्थिति को चन्द्रग्रहण कहते हैं।

 व्याख्या आधुनिक खगोल-विज्ञान की परिभाषा से पूर्णतः साम्य स्थापित करती है, जहाँ ग्रहण को Umbra तथा Penumbra की छाया-संरचना के माध्यम से प्रबोध कराया जाता है। आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, ग्रहणों की गणना न्यूटनियन यांत्रिकी तथा खगोलीय ज्यामिति पर आधारित है एवं  ग्रहणों की तिथि, अवधि तथा प्रकार की सटीक भविष्यवाणी संभव है। आर्यभट ने  स्व-समय में ही ग्रहणों की गणना, चंद्र-कक्षा, तथा छाया की दीर्घता सदृश विषयों पर गणितीय सूत्र दिए, जो उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक परंपरा का पूर्वगामी सिद्ध करते हैं। यह एक ऐतिहासिक विडंबना है कि जिस सभ्यता ने ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या दी, उसी सभ्यता में अद्यापि ग्रहण को अशुभ, दोषपूर्ण तथा सूतक-जन्य माना जाता है। अद्यापि ग्रहण के समय भोजन-वर्जना, धार्मिक भय, तथा गर्भवती स्त्रियों से सम्बंधित आशंकाएँ सामाजिक विमर्श का अंग हैं, जबकि इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह स्थिति वैज्ञानिक चेतना और परंपरागत अंधविश्वास के मध्य गहरे द्वंद्व को दर्शाती है।

आर्यभट का ग्रहण-सिद्धांत यह प्रमाणित करता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान तर्क, निरीक्षण तथा गणना पर आधारित था। ग्रहणों के विषय में व्याप्त अंधविश्वास न तो भारतीय ज्ञान परंपरा का अनिवार्य अंग हैं तथा न ही शास्त्रीय विज्ञान का निष्कर्ष। अतः आवश्यक है कि आर्यभट सदृश वैज्ञानिकों को केवल गौरवगाथा तक सीमित न रखा जाए, अपितु उनके वैज्ञानिक चिंतन को शिक्षा तथा सामाजिक चेतना का अंग निर्मित किया जाए क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टि का पुनरुद्धार ही भारतीय परंपरा की यथार्थ निरंतरता है।
                   ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

Wednesday, May 28, 2025

लालू यादव ने पोते का नाम 'इराज' रखा।क्या आप जानते हैं इस शब्द का अर्थ? आइए देखते हैं👇

लालू यादव ने अपने पोते का नाम 'इराज' रखा है। देखने सुनने में यह एक इस्लामिक शब्द प्रतीत होता है, खासकर उन लोगों को जिन्हें शब्दों का ठीक-ठाक ज्ञान नहीं है। दरअसल 'इरा' संस्कृत भाषा का शब्द है। वैय्याकरणों को विदित होगा कि 'इरा' शब्द स्त्रीलिंग है जिसका अर्थ सुरा(मदिरा),भूमि आदि है। व्युत्पत्ति के तौर पर देखें तो स्त्रीलिंग की विवक्षा में  इ धातु में रन् तथा टाप् प्रत्यय जोड़ने से इरा शब्द निष्पन्न होता है। कहीं-कहीं पुल्लिंग की विवक्षा में  भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है।

इरा शब्द पर टिप्पणी से पूर्व इला पर टिप्पणी का पठन उपयोगी होगा। वैदिक निघण्टु में इरा का वर्गीकरण अन्न नामों के अन्तर्गत किया गया है। जैमिनीय ब्राह्मण २.४१२ तथा तैत्तिरीय संहिता ७.५.९.१ का कथन है कि यज्ञ विशेष में एक दिन के यज्ञ की समाप्ति इलान्त साम द्वारा करके ही प्रजापति ने प्रजा के लिए अन्नों में सर्वश्रेष्ठ अन्न इरा प्रदान किया। इसका तात्पर्य होगा कि अचेतन मन के स्तर पर इला रूपी आनन्द का विकास पूर्ण होने पर ही इरा का विकास आरम्भ होता है। इला शब्द में ल पृथिवी तत्त्व का, स्थिरता का सूचक है जबकि इरा में र अक्षर अग्नि का, गति का सूचक है। ऋग्वेद ५.८३.४ के अनुसार जब पृथिवी पर पर्जन्य वृष्टि होती है तो विश्व में इरा उत्पन्न हो जाती है(ओषधि-वनस्पतियों को भी इरा कहते हैं)। तैत्तिरीय संहिता २.६.७.२ से संकेत मिलता है कि यदि यज्ञीय इडा, इडा की पकी हुई अवस्था को प्राप्त करना है तो इरा को बृहद् रूप देकर उसे द्युलोक में स्थापित करना पडेगा। इसके पश्चात् इरा गौ बन कर पृथिवी पर, मन के स्तर पर इडा गौ पशु के रूप में अवतरित होगी जिसके पद-पद से घृत की सृष्टि होगी। इस प्रकार इडा और इरा का विकास एक दूसरे पर आश्रित है।

पुराणों में इरा को काश्यप की तथा पुलह की पत्नी कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.५ में इरा को विश्वसृजों/देवताओं की पत्नी कहा गया है। बौधायन श्रौत सूत्र १७.१९.१ में विश्वसृज सत्र के वर्णन में इरा को तप नामक गृहपति की पत्नी कहा गया है।अन्यत्र इडा की तुलना दिति से और इन्द्राणी/शची की तुलना अदिति से की गई है(अथर्ववेद १५.६.२०)। अतः यह संभव है कि इरा की स्थिति दिति और अदिति के बीच की हो।

विभिन्न भाषाओं में इरा शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में हुआ है। वहाँ इस शब्द का प्रयोग सतर्क,समर्पित तथा शक्तिशाली आदि अर्थों में किया गया है। बाइबिल में इरा किंग डेविड का पुजारी है।

बहरहाल.. यह तो हुई इरा शब्द की बात। अब बात करते हैं-इराज शब्द की,तो इरा से उत्पन्न होने वाला 'इराज' कहलाता है। अब आप इसका अर्थ अपने अनुसार-भूमि से उत्पन्न, सुरा से उत्पन्न या शक्तिशाली से उत्पन्न लगा सकते हैं।

इस प्रकार लालू यादव को यह कहकर कि उन्होंने इस्लामिक नाम रखा, ट्रोल करना उचित नहीं। हाँ, बाकी मुद्दों पर तो ट्रोल होने के हकदार वे हैं ही! हम अपनी भाषा तथा ग्रन्थों के शब्द जानकारी के अभाव में अन्य सम्प्रदाय के पाले में न फेकें।

                          ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

Monday, July 15, 2024

भक्ति और उसके पुत्र

🍂'भज् सेवायाम्' धातु से क्तिन् प्रत्यय करने पर 'भक्ति' शब्द की निष्पति होती है,जिसका अर्थ है सेवा करना। सेवा करने को 'भजन' भी कहते हैं, इसलिए 'भजना' भी भक्ति ही है। इष्ट के प्रति अनुराग ही भक्ति है। यह नौ प्रकार की कही गयी है। सतयुग में भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकशिपु को नवधा भक्ति का जो उपदेश दिया उसका उल्लेख भागवतमहापुरण में है-

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।
             -श्रीमद्भागवतमहापुराण-7/5/23

भक्ति के उक्त नौ प्रकारों में श्रवण किया था राजा परीक्षित ने,कीर्तन शुकदेव जी,स्मरण प्रह्लाद,पादसेवन(चरणों की सेवा) लक्ष्मी,अर्चन राजा पृथु,वन्दन अक्रूर,दास्य हनुमान्,सख्य अर्जुन,तथा आत्मनिवेदन वाली भक्ति राजा बलि ने की थी।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने माँ शबरी को जिस नवधा भक्ति का उपदेश दिया था,वह प्रह्लाद की नवधा भक्ति से भिन्न है, जो इस प्रकार हैं-

प्रथम भगति सन्तन्ह कर सङ्गा।
दूसरि रति मम कथा प्रसङ्गा।

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि मान।

मन्त्र जाप मम दृढ़ विस्वासा।
पंचम भजन सो बेद प्रकाशा।

छठ दम शील बिरति बहु कर्मा।
निरत निरंतर सज्जन धर्मा।

सातवँ सम मोहि जग देखा।
मोतें सन्त अधिक करि लेखा।

आठौं जथालाभ संतोषा।
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।

नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियँ हरष न दीना।

-उक्त दोनों नवधा भक्तियाँ  सरल और सुकर हैं। इनमें से यदि कोई एक प्रकार की भक्ति भी मनुष्य करे तो उसका उद्धार सम्भव है। भक्ति के साथ ज्ञान और वैराग्य जुड़े हैं। वस्तुतः ये ज्ञान और वैराग्य, भक्ति के पुत्ररूप हैं जिनका संग पाकर भक्ति और भी पुष्ट हो उठती है किन्तु कलियुग में ज्ञान और वैराग्य की हालत दयनीय है।

                      ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

Saturday, June 29, 2024

प्रसन्नता का रहस्य

🍂प्रसन्नता कैसे प्राप्त करें? वास्तव में इस लोक में प्रत्येक व्यक्ति इसी प्रश्न का उत्तर खोज रहा है। यह एक आंतरिक खोज है। एक ऐसी आन्तरिक प्रेरणा,जो जन्म से मृत्यु तक मनुष्य की समस्त गतिविधियों के लिए उत्तरदायी है। प्रसन्नता की खोज ही मानव को समस्त भौतिक सुविधाओं की ओर धकेलती है। यह एक ऐसी प्यास है जो कभी नहीं बुझती।इसके वशीभूत होकर ही मनुष्य भौतिक संसाधन जुटाता फिरता है किन्तु दुःखद है कि जिस प्रसन्नता के लिए वह अहर्निश प्रयत्न करता है,वह उसे कभी नहीं प्राप्त होती।

मनुष्य आख़िर कब इस सत्य को पहचानेगा कि प्रसन्नता,धन-सम्पत्ति या भौतिक संसाधनों से नहीं मिल सकती!सच कहूँ तो प्रसन्नता के चक्कर में हम  अपने भीतर तृष्णा भर रहे हैं तथा चित्त को अशान्त करते हैं। हम उन चीजों को पाने का यत्न करते हैं जो हमारे पास नहीं हैं।हम यह भूल जाते हैं कि संसार के सुखों में भय,पीड़ा,चिंता,अवसाद तथा कुंठा आदि विकार मिश्रित हुआ करते हैं।

स्वामी शिवानन्द सरस्वती कहते हैं कि "हे मानव!तुम उस विशुद्ध आनन्द,अनन्त शांति और प्रसन्नता का अनुभव कर सकते हो,यदि अपने भीतर सुन्दर चिंतन,अनुभव,विचार,कर्म,वाणी,विश्वास तथा आचरण विकसित कर सको।जीवन को अध्यात्म की ओर ले जाकर उसे दिव्य बनाओ।ईश्वर का स्मरण करते हुए जागो। जैसे ही नींद से जागो तो सर्वप्रथम उस अदृश्य, सर्वशक्तिमान् ईश्वर का ध्यान करो।"

यदि हम इस प्रकार ईश्वर का स्मरण करेंगे,उनसे प्रार्थना करेंगे तो हम अपने दैनिक जीवन के संघर्षों का सामना करने हेतु आत्मिक शक्ति प्राप्त कर सकेंगे। प्रार्थना का आत्मा के लिए वही महत्त्व है,जो शरीर के लिए भोजन का। बिस्तर से उठने से पहले ही यह दृढ़ संकल्प करें कि दिनभर कुछ न कुछ अच्छा करेंगे। जब तक कोई दिव्य जीवन जीना  नहीं सीखेगा,उसे भौतिक संसाधन प्रसन्नता नहीं दे सकेंगे।मनुष्य का भविष्य उसके विचारों और कर्मों से बनता है।इसलिए इसी क्षण अपने विचार और मानसिक स्थिति को बदलिए। सत्य का जीवन जिओ, दिव्य जीवन यापन करो तथा सदैव प्रसन्न रहो। प्रभु हमें अच्छा स्वास्थ्य, दीर्घायु,शान्ति, मोक्ष तथा आत्म प्रकाश से पूरित कर देंगे।

    #पढ़ते_पढ़ते                ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

Friday, October 27, 2023

वाल्मीकि डाकू नहीं थे,पढ़िये उनकी जयंती पर विशेष लेख

ऋषि कश्यप तथा अदिति के नौवें पुत्र थे वरुण। वरुण का एक विशेषण या अन्य नाम है-'प्रचेतस्'। इन्हीं प्रचेतस् के पुत्र रूप में जन्मे 'रत्नाकर'। प्रचेतस् का पुत्र होने के कारण इन्हें प्राचेतस् भी पुकारा जाता है।रत्नाकर बचपन से ही तपस्वी प्रवृत्ति के थे। एक बार ये ध्यान लगाकर बैठे तो समय का भान ही न रहा। दीर्घकाल तक ध्यानावस्था में बैठे रहने के कारण इनके शरीर को दीमकों ने पूरी तरह ढक लिया। दीमकों को वल्मीक भी कहा जाता है।जब इनका ध्यान टूटा और ये दीमकों की उस बाँबी से बाहर निकले तो "वाल्मीकि" कहलाये। जनश्रुति के अनुसार रत्नाकर के डाकू होने की कथा मुझे मान्य नहीं। ऐसी कथाएँ मनुष्य को प्रेरित करने के उद्देश्य से गढ़ी जाती हैं कि जब एक अपराधी किस्म का व्यक्ति भगवान् का सुमिरन करके महाज्ञानी बन सकता है तो हम क्यों नहीं!

परमपिता ब्रह्मा जी की प्रेरणा से ब्रह्मर्षि नारद इनसे मिले और रामकथा लिखने के लिए प्रेरित किया। ऐसा उल्लेख स्वयं वाल्मीकिरामायण में है। उस समय तक वैदिक संस्कृत का बोलबाला था। लौकिक संस्कृत में कोई भी रचना उस समय तक नहीं हुई थी। स्नान हेतु नदी में गए वाल्मीकि ने देखा कि एक बहेलिए ने मैथुन कार्य में मग्न क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार गिराया। शेष बचा क्रौंच अपने साथी के विरह में शोक प्रकट कर रहा था। वाल्मीकि को यह दृश्य देखकर दुःख हुआ। उस घटना ने वाल्मीकि के हृदय में हलचल मचा दी।उनके हृदय में इतना अधिक शोक उपजा कि वह शोक,श्लोक रूप में प्रस्फुटित हो उठा-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती: समा:।
यत्क्रौञ्च मिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।

इस श्लोक के माध्यम से उन्होनें उस बहेलिए को शाप दिया और इस प्रकार अनुष्टुप छन्द में बद्ध इस श्लोक ने लौकिक काव्य सर्जना का सूत्रपात किया।      इसीलिए वाल्मीकि को आदिकवि की संज्ञा दी गयी तथा इनकी कृति वाल्मीकिरामायण को आदिकाव्य कहा गया। शरदपूर्णिमा तिथि को वाल्मीकि का प्राकट्य दिवस माना जाता है तथा प्रत्येक वर्ष इस तिथि को इनकी जयंती मनायी जाती है। 
नमन,हे आदिकवि!💐
                             ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

Monday, August 28, 2023

रक्षाबन्धन का आरम्भ और महत्त्व

🍂सनातन की परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा आचार-विचार में वैदिकता अवश्य परिलक्षित होती है।कोई भी परम्परा एक दिन में नहीं प्रसारित हुई बल्कि इसके लिए वर्षों का समय लगा। हमारे त्योहार जो हमें एकता के सूत्र में पिरोते हैं,वे अत्यंत प्राचीन काल से मनाये जाते रहे हैं।

 इनके पीछे न केवल ऐतिहासिक कारण बल्कि वैदिक और पौराणिक कारण भी उत्तरदायी हैं। बात करें रक्षाबन्धन की तो इसके पीछे भी वैदिक कारण है।हिन्दू एवं जैन मतावलम्बियों द्वारा स्वीकार्य प्रेम एवं सुरक्षा का यह त्योहार सबसे पहले तब अस्तित्व में आया जब देवासुर संग्राम छिड़ा था। देवताओं की शक्ति आसुरिक शक्तियों के सम्मुख कमतर पड़ने लगी थी।यह देखकर देवराज इंद्र चिन्तित हो गए तथा उन्होंने देवगुरु बृहस्पति से प्रार्थना की कि गुरुदेव! अब आप ही कुछ कीजिये ताकि हम देवगण असुरों से विजय प्राप्त कर सकें। 

तब देवगुरु ने सावन माह की पूर्णिमा को आक के रेशों का रक्षासूत्र बनाकर देवराज की कलाई पर बाँध दिया और आश्वासन दिया कि यह रक्षासूत्र तुम्हारी रक्षा करेगा और विजय प्राप्त कराएगा। इस प्रकार मानव संस्कृति में  प्रथम रक्षासूत्र बाँधने वाले देवगुरु बृहस्पति हुए।तभी से सुरक्षा की कामना से यह रक्षासूत्र बाँधने का प्रचलन आरम्भ हुआ। पौराणिक कथा कहती है कि भगवान् विष्णु ने अपने वामन अवतार में राजा बलि के हाथ में रक्षासूत्र बाँधकर उसे वचनबद्ध किया था। इस प्रकार यह रक्षासूत्र सङ्कल्प का प्रतीक भी माना जाता है । मध्य इतिहास में भी पढ़ने को मिलता है कि मेवाड़ को बहादुरशाह से बचाने के लिए चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णावती ने मुगल शासक हुमायूँ को राखी भेजी थी। 

यह रक्षासूत्र किसी को भी बाँधा जा सकता है किन्तु  भाई-बहन के त्योहार के रूप में अधिक प्रचलित है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई में राखी बाँधकर उसे अपनी सुरक्षा के लिए वचन बद्ध करती है। एक प्रकार से इस बात का भी द्योतक है कि इस दिन रक्षा सूत्र बाँधकर हम अपने किसी उद्देश्य की प्राप्ति का संकल्प लेते हैं। आजकल विभिन्न प्रकार की राखियाँ बाजार में उपलब्ध हैं,आप अपनी पसन्द की राखी ले सकते हैं किन्तु एक होती है वैदिक राखी जिसके पीछे थोड़ा सा वैज्ञानिक कारण छिपा है। दूर्वा, केसर,चावल,चंदन,हल्दी और सरसों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर एक पीले रंग के रेशमी कपड़े में बाँध लें और इसकी सिलाई कर दें।इसके बाद इसे मौली या कलावे में  पिरो दें। इस प्रकार आपकी वैदिक राखी तैयार हो जाएगी। इसमें मौजूद पदार्थ आपको संक्रामक बीमारियों से बचायेंगे। 

राखी या रक्षासूत्र बाँधते समय इस मंत्र का उच्चारण करना भी शुभ होता है-🍂
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।। 
इस मंत्र का अभिप्राय यह है कि जिस रक्षासूत्र से महाबली राजा बलि को वचनबद्ध कर दिया,वही रक्षा सूत्र मैं आपको बाँधता/बाँधती हूँ। यह रक्षासूत्र सदैव आपको अपने संकल्प का स्मरण कराता रहे तथा कभी टूटे नहीं।    
                       ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

फ़ोटो साभार गूगल

Saturday, August 26, 2023

वेदों में सूर्य (Solar)


वेदों में सूर्य और सौर-ऊर्जा से सम्बन्धित विस्तृत सामग्री प्राप्त होती है।यथा-सूर्य का महत्त्व,अनेक सूर्य,सूर्य की शक्ति का आधार,सूर्य और चराचर का सम्बन्ध,सौर ऊर्जा के विविध चमत्कार आदि का वर्णन। सूर्य जगत् की आत्मा है। सूर्य से ही इस धरा का जीवन है। यह सर्वमान्य तथ्य है। वैदिक काल में भी सूर्य को समस्त जगत् का कर्त्ता स्वीकार किया जाता रहा है।सौरमण्डल का यह अति विशिष्ट ग्रह है जो चराचर जगत् को ऊर्जा प्रदान करता है। यह सौरमण्डल के समस्त ग्रहों-उपग्रहों का नियन्ता भी है।समूचा सौरमण्डल इसी से ऊर्जित हुआ करता है।यही अपने आकर्षण से पृथ्वी आदि ग्रहों को रोके हुए है। इसी से संसार को जीवनी शक्ति मिलती है इसीलिए इसे आत्मा कहा गया है।

यजुर्वेद में चक्षो: सूर्योsजायत कहकर सूर्य को ईश्वर का नेत्र कहा गया है।ऋग्वेद के एक मन्त्र में उल्लेख है कि नानासूर्या: और सप्तादित्या: अर्थात् सूर्य अनेक हैं।सात सूर्य से आशय ज्ञात होता है कि सात सौरमण्डल हैं।
    "सप्त दिशो नाना सूर्या:।देवा आदित्या ये सप्त।"
                  -ऋग्वेद-9.114.3
अथर्ववेद का कहना है कि केंद्रीय सूर्य कश्यप है।ये सात सूर्य उसके अंग हैं।तैत्तिरीय आरण्यक (1.7.1)में इन सप्त सूर्यों के उल्लिखित  हैं-आरोग, भ्राज,पटर, पतंग,स्वर्णर,जयोतिषीमान् और विभास।
 "कश्यप...यस्मिन् अर्पिता: सप्त साकम्।"
                -अथर्ववेद-13.3.10
अथर्ववेद (14.1.2)में वर्णित है कि सूर्य की ऊर्जा का स्रोत सोम अर्थात् हाइड्रोजन है-"सोमेन आदित्या बलिन:।" यजुर्वेद में इसे दूसरे रूप में प्रस्तुत किया गया है।मन्त्र का कथन है कि सूर्य में ये दो तत्त्व मिलते हैं-
1.अपां रसम् जल का सारभाग है,जो ऊर्जा के रूप में है।उद्वयस् शब्द ऊर्जारूप या गैसरूप अर्थ का बोधक है।जल का यह सारभाग हाइड्रोजन है। हाइड्रोजन के 'अपां रस:' इस पारिभाषिक शब्द का प्रयोग हुआ है।
2.'अपां रसस्य यो रस:' का अर्थ है-जल के सारभाग का सारभाग। जल का सारभाग हाइड्रोजन है और उसका सारभाग हीलियम है।मन्त्र में 'सूर्ये सन्तं समाहितम्' के द्वारा स्पष्ट किया गया कि ये दोनों तत्त्व सूर्य में विद्यमान हैं। 

आधुनिक विज्ञान के अनुसार सूर्य में 90% हाइड्रोजन है,8%हीलियम और 2% अन्य द्रव्य।सूर्य की सतह का तापमान छ: हजार डिग्री सेंटीग्रेड है।इस आंतरिक ताप के कारण हाइड्रोजन,हीलियम में परिवर्तित हो जाता है।इसे थर्मो न्यूक्लियर रीएक्शन्स कहा जाता है। तो जिन तथाकथित विद्वानों को यह लगता है कि वेद अप्रमाणिक हैं,उनमें वैज्ञानिकता का अभाव है,वे वेदों का गहन अध्ययन करें। देश के प्रतिष्ठित संस्थान इसरो चीफ ने यदि वेदों का हवाला दिया है तो उस पर विश्वास करने की जरूरत है,उससे सीख लेने की जरूरत है। सरकार का भी यह दायित्व है कि संस्कृत विषय को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाए तथा ज्ञान-विज्ञान की अक्षय निधि वेदों का प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि भारत की आधुनिक पीढ़ी इस अपरिचित सत्य से परिचित हो कि भारत के ऋषि-मनीषियों ने वर्षों की मेहनत से वेदरूपी ज्ञान हमें सौंपा था। 
                       ✍️ डॉ. अनुज पण्डित

Sunday, June 11, 2023

उपनिषद्-चर्चा-भाग-9 ( मुण्डकोपनिषद्)

अथर्ववेद से सम्बन्धित यह उपनिषद् दो दो खण्डों के तीन मुक्तकों में विभाजित है ।पदार्थ, ब्रह्मविद्या तथा आत्मा-परमात्मा इसके वर्ण्य विषय हैं।इसमें ऋषि अंगिरा तथा उनके शिष्य शौनक का संवाद दिखाया गया है।जगत्कर्ता ब्रह्मा,अथर्वा, अंगी  सत्यवह तथा अंगिरा की "ब्रह्मविद्या" की आचार्य परम्परा थी । शौनक ने जिज्ञासा की कि किस तत्त्व के जान लेने पर सबकुछ अवगत हो जाया करता है?इस जिज्ञासा के शमन हेतु अंगिरा ने ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया। विद्या के दो भेद परा और अपरा करने के बाद अपरा को वेद-वेदाङ्ग से जोड़ा तथा परा को को उस ज्ञान से जोड़ा जिससे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है-"तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेद:सामवेदोsथर्ववेद: शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।"

इस उपनिषद् में परमात्मा द्वारा अपने अंदर से विश्वनिर्माण का वर्णन है। उदाहरण स्वरूप कहा गया -"द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते तयोरन्न: पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।" अर्थात् एक पेड़ पर दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी बैठे हैं।एक फल को खा रहा है,दूसरा उसे खाता देख रहा है। यहाँ पेड़ प्रकृति है जिसे एक पक्षी भोग रहा है,उसे आत्मा के समान माना गया है और दूसरा जो खाते हुये देख रहा है उसे परमात्मा के समान माना गया है,जो भोग तो नहीं करता किन्तु देखता रहता है ।

इसी उपनिषद् का मंत्र "सत्यमेव जयते" भारत के राष्ट्रचिह्न का भाग है ।पूरा मंत्र इस प्रकार है-

सत्यमेव जयति नानृतं, सत्येन पन्था विततो देवयान:।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्।।

"जयते"प्रयोग व्याकरणिक दृष्टि से अशुद्ध है।"सत्यमेव जयति" ही शुद्ध रूप है।

ब्रह्मा ने जो ब्रह्मविद्या अथर्वा ऋषि को दी,वही ब्रह्मविद्या अथर्वा ने अङ्गी ऋषि को ट्रान्सफर कर दी,अङ्गी ने सत्यवह को और सत्यवह ने अङ्गिरा ऋषि को प्रदान की ।एक ऋषि हुए-शौनक जो एक विशाल विश्वविद्यालय के कुलपति हुआ करते थे। पुराणों के अनुसार उनके ऋषिकुल में अट्ठासी हजार ऋषि हुआ करते थे। उन सबने अङ्गिरा ऋषि से निवेदन किया कि भगवन्! वह कौन-सा परमतत्त्व है जिसके जान लेने पर सब जान लिया जाता है! तब अङ्गिरा बोले कि मनुष्य को जानने के लिए दो विद्याएँ हैं-,परा और अपरा।

जिसके द्वारा परब्रह्म अविनाशी परमात्मा का तत्त्वज्ञान होता है,वह परा विद्या है। उसका वर्णन वेदों में है। इतना अंश छोड़कर  अन्य समस्त वेद और वेदाङ्गों को अपरा विद्या के अन्तर्गत रखा गया है।जिसके द्वारा लोक और परलोक सम्बन्धी भोगों तथा उनकी प्राप्ति के साधनों का ज्ञान प्राप्त हो,वह अपरा विद्या है । समस्त ऋषि बोले कि अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर है कैसा? तो अङ्गिरा ने बताया कि वे परमेश्वर ज्ञानेंद्रियों द्वारा ज्ञेय नहीं हैं और न ही कर्मेन्द्रियों द्वारा पकड़ में आते।वे गोत्र आदि उपाधियों से रहित हैं,वर्ण,रंग,आकृति से भी रहित हैं। अत्यंत सूक्ष्म,व्यापक,अन्तरात्मा रूप से सबमें फैले हुए हैं। वे कभी नाश को प्राप्त नहीं होते, सर्वथा नित्य भी हैं। वे समस्त प्राणियों के कारण हैं तथा सर्वत्र व्याप्त हैं।

◆वे परमेश्वर समस्त प्राणियों के कारण कैसे हैं,समस्त जगत् उनसे किस प्रकार उत्पन्न होता है?

अङ्गिरा ने उत्तर में पहले  समझाया कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेट में स्थित जाले को बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है,उसी प्रकार वह परब्रह्म अपने भीतर सूक्ष्म रूप से लीन हैं और प्रलयकाल में पुनः उसे अपने में लीन कर लेते हैं। यही बात भगवद्गीता(अध्याय-९,श्लोक-७)  में कही गयी है-

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तादि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।

दूसरे उदाहरण के द्वारा यह बात समझायी कि जिस प्रकार पृथ्वी में अन्न, तृण, वृक्ष,लता आदि ओषधियों के बीज पड़ते हैं,उसी प्रकार भिन्न-भिन्न भेदों वाली ओषधियाँ वहाँ उत्पन्न हो जाती हैं। उसी प्रकार जीवों के कर्म रूप बीजों के अनुसार ही भगवान् उनको भिन्न-भिन्न योनियों में पैदा किया करते हैं। अर्थात् उनमें किसी भी प्रकार की विषमता और निर्दयता का दोष नहीं रहता।

                               ✍️ अनुज पण्डित
                               

फ़िल्म आदिपुरुष

🍂आदिकाव्य रामायण के बाद जितने भी महाकाव्य लिखे गये, वे सब तो कहीं न कहीं कथानक की दृष्टि से रास आते हैं। कोई न कोई नवीन दृष्टिकोण समक्ष आता है। कहीं न कहीं राम की मर्यादा को भी मण्डित करते नजर आते हैं किंतु रामानन्द सागर निर्मित धारावाहिक रामायण के पूर्व और उत्तरवर्ती जितने भी रामपरक  धारावाहिक,फिल्म्स और वेबसीरीज आयीं,सब की सब फिसड्डी हैं।रामानन्द सागर ने जनमानस में रामायण की कहानी,दृश्य और पात्रों को इस तरह पैवस्त कर दिया है कि अब कोई रामपरक दृश्य नहीं सुहाता।

आदिपुरुष के टीजर को लेकर पहले ही काफ़ी निराशा देखने को मिली है। जनमानस के लिए कहीं से भी कथानक,दृश्य और पात्रों का कॉस्ट्यूम फिट बैठते नजर नहीं आते। तकनीकी प्रयोग ने इस  फ़िल्म को रामकथा कम,कार्टूनिस्ट अधिक बना दिया है। न तो पात्रों के परिधान उपयुक्त हैं ,न ही संवाद और न ही वह सौम्यता दिखती है जो एक मर्यादित और सौम्य राम की विशेषता है ।हनुमान् को देखकर रंचमात्र भी वह भाव नहीं उठता जो दारा सिंह को देखकर उठता है। 

ढाई-तीन मिनट के ट्रेलर में मैं प्रभास के चेहरे पर वह स्मित मुस्कान तलाश रहा था जो अरुण गोविल ने दी। वनवासी राम लक्ष्मण और सीता कहीं पर भी वल्कल वस्त्र पहने नहीं दिखते। परिधान देखकर लगता है कि पात्रों को चर्मवस्त्र पहना दिया गया है! सनातन से जुड़े किस्से,कहानियाँ सामने आनी चाहिए किन्तु वे अच्छी प्रकार संस्कारित तो हों! मुझे नहीं लगता कि जिन लोग ने रामानन्द सागर की रामायण का रसपान किया है,उन्हें यह फ़िल्म एक कार्टून से अधिक कुछ लगेगी! हाँ, नई पीढ़ी अवश्य राम कथा से सम्बंधित इस फ़िल्म के मुताबिक धारणा बना लेगी।
                  ✍️ अनुज पण्डित

धर्म एवं अध्यात्म

🍂जब आप अपने आप को किसी धर्म के साथ जोड़ते हैं तो आप खुद को विश्वास करने वाला मान बैठते हैं किन्तु जब आप कहते हैं कि मैं "आध्यात्मिक मार्ग पर हूँ" तो आप स्वयं को जानने की इच्छा रखने वाला,जिज्ञासु कहते हैं। विश्वास,जानने,जिज्ञासा करने तथा खोजने में क्या अंतर है?आप वही खोजते हैं जिसे आप जानते नहीं। खोजने और जानने की प्रकिया में मूल बात यह है कि आपने यह समझ लिया है कि आप अपने जीवन के मूल स्वभाव को नहीं जानते।आपको नहीं ज्ञात कि आप कहाँ से आये हैं?,कौन हैं?,क्या हैं? और कहाँ को जायेंगे? आप जानना चाहते हैं या जानने की कोशिश करते हैं। जब आप "मैं नहीं जानता" कि अवस्था में हैं तब आप किसी के साथ झगड़ा नहीं कर सकते!

कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किसने क्या कहा है! चाहे कृष्ण हों,जीसस हों,बुद्ध या किसी और ने कहा हो।हो सकता है कि वे सत्य ही कह रहे हों और उनके लिए हमारे भीतर पूरा सम्मान हो! पर आप नहीं जानते,आपने इन्हें देखा नहीं है,आपने इसका अनुभव नहीं किया है।आप पूरी तरह ईमानदार क्यों नहीं हो सकते?आप नहीं जानते।मैं नहीं जानता-में एक जबरदस्त संभावना है-जानने का आधार।जब आप मानते हैं कि आप नहीं जानते तभी जानने की सम्भावनाएँ खुलती हैं।जैसे ही आप इस संभावना को अपने विश्वास से तोड़ देते हैं तो आप जानने की समस्त संभावनाओं को खत्म कर देते हैं।
                     
आप ऊपर देखते हैं,नीचे देखते हैं,पूरब या पश्चिम देखते हैं या आप अपने चारों ओर देखते हैं ,इससे कोई आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू नहीं होती।आध्यात्मिक प्रक्रिया तब शुरू होती है,जब आप अंदर की ओर देखते हैं।जो अंदर है,उसका कोई आयाम नहीं है और बिना आयाम की चीज तक वही पहुँच सकता है जो अपने  भीतर बिलकुल ईमानदार हो।आपको दूसरों के लिए ईमानदार होने को नहीं कहा जा रहा है।इसमें बहुत सी समस्याएँ हो सकती हैं।
                     ✍️ अनुज पण्डित

Wednesday, May 24, 2023

धर्म का आधार वेद हैं: मनुस्मृति

वेदों में धर्म का  पूरा प्रतिपादन किया गया है।एकमात्र वेद ही धर्म का मुख्य आधार हैं।इसके अतिरिक्त धर्म के तत्त्व को जानने वाले शास्त्रों,चरित्र की उत्तमता,महात्माओं के आचरण एवं आत्मा की सन्तुष्टि को भी धर्म तत्त्व का आधार मानते हैं ।अभिप्राय यह कि धर्म और अधर्म का निर्णय करने के लिए सबसे पहले वेद को प्रमाण मानना चाहिए।यदि कहीं वेद से सन्तुष्टि नहीं हो पाती तब शास्त्रों के ज्ञान को प्रामाणिक मानना चाहिए,लेकिन यदि किसी तत्त्व का निर्णय शास्त्रों से भी नहीं हो पाता तो महात्माओं के चरित्र को पढ़कर निर्णय लेना चाहिए।यदि इससे भी सन्तुष्टि न मिले तो अपनी आत्मा को जिससे सन्तुष्टि मिले, वही श्रेयस्कर है।

भगवान् मनु ने विभिन्न वर्णों के लिए जिन कर्मों का विधान किया,उनका आधार वेद ही हैं।वे वेद को समस्त ज्ञान का मूल स्रोत मानते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि मनु ने जो कुछ भी कहा,वह वेद के अनुसार ही है।अतः मनुस्मृति एक प्रामाणिक ग्रन्थ है।

मनुस्मृति में दिये गए विषय की जाँच-पड़ताल करने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि इसमें जो उल्लेख है,क्या वह वेद-आधारित है? यदि वेद पर आधारित है तो वह स्वत: प्रमाण है। ऐसा कहने के पीछे मनु का विचार यह रहा होगा कि यदि कोई दूसरा विद्वान् उनके नाम से कोई वेद विरुद्ध ज्ञान मनुस्मृति में मिलायेगा तो भावी विद्वान् उसे स्वीकारेंगे नहीं। ऐसा कहकर मनु ने भावी पीढ़ी को मनुस्मृति की समयानुकूल व्याख्या करने की पर्याप्त स्वतंत्रता दे दी है।यह निश्चय ही उनके महान् भविष्यद्रष्टा और पूर्ण ज्ञानी होने के स्वरूप को स्पष्ट करता है। मनुस्मृति को पढ़ने वाले को चाहिए कि वह इसे ज्ञान पूर्वक पढ़े। अज्ञानी और मूर्ख लोग पढ़ेंगे तो उसे समझ ही नहीं सकेंगे और जब नहीं समझ सकेंगे तो उसे व्यर्थ की पुस्तक मानकर उसे जला देंगे जो कि अत्यंत निंदनीय है।
                     ✍️अनुज पण्डित

Wednesday, May 17, 2023

श्री राम, विष्णु के नहीं तो फिर किसके अवतार हैं?

🍂इन दिनों पुनः रामचरितमानस का अध्ययन कर रहा हूँ। विश्व का एकमात्र लोकप्रिय और प्रसिद्ध ग्रन्थ रामचरितमानस जितनी बार पढ़ो,उतनी बार कुछ न कुछ नया तथ्य सामने उभरकर आता है। अधिकांश जन या यों कहूँ कि सभी को यही पता है कि श्रीराम श्रीहरि विष्णु के अवतार हैं। मुझे भी अब तक यही पता था किन्तु मैंने जब बालकाण्ड को दोहा नम्बर 141 से पढ़ना आरम्भ किया तो पाया कि श्रीराम विष्णु नहीं बल्कि ब्रह्म के अवतार हैं। ब्रह्म यानी सच्चिदानन्द स्वरूप,जगत् का मूल तत्त्व,ईश्वर और परमात्मा। वह ब्रह्म जिसका स्वरूप शंकर के मन में बसता है,सगुण और निर्गुण कहकर वेद जिसकी प्रशंसा करते हैं,जिसके अंश से अगणित ब्रह्मा,विष्णु,महेश,लक्ष्मी, पार्वती तथा ब्राह्मणी उत्पन्न हो जाया करते हैं ।जो अनादि है,अजन्मा है,निर्विकारी है,वह ब्रह्म।

दोस्तों!स्वायम्भुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा ने तप करने के उद्देश्य से जब नैमिषारण्य की ओर गमन किया तथा गोमती नदी के तट पर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करने लगे तो उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी कई मर्तबा उनके पास आये किन्तु उन्होंने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि जाइये, आपसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं,हमारा प्रयोजन तो किसी और से ही है। यह सुनकर त्रिदेव आश्चर्य में पड़ गए कि हम तीनों से बड़ा कौन है,जिससे इनका प्रयोजन है!तब उस "बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।कर बिनु करम करइ बिध नाना।।आनन रहित सकल रस भोगी।बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।"-ब्रह्म ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आकाशवाणी की -"वर माँगो।" पहले तो मनु-शतरूपा ने उनके स्वरूप का दर्शन करना चाहा फिर अपने पुत्र के रूप में उनकी कामना की।

परब्रह्म परमेश्वर ने  तथास्तु कहा और बोले कि अभी तुम दोनों इंद्र की राजधानी अमरावती में निवास करो। कुछ समय बीतने के बाद तुम अवध के राजा होंगे और मैं तुम्हारा पुत्र। यही कथा मिलती है रामचरितमानस में। उक्त सन्दर्भ को पढ़कर आपका भ्रम शायद दूर हो! 
                            ✍️ अनुज पण्डित

Friday, May 5, 2023

प्रकृति के पुजारी और सूक्ष्म निरीक्षक थे ये कवि👇

🍂प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षक -'कालिदास'

भारतीय सनातन और काव्य परम्परा में प्रकृति को देवी का दर्जा दिया गया है। संस्कृत साहित्य कवियों के कुलगुरु महाकवि कालिदास को प्रकृतिदेवी का अनुपम पुजारी माना जाता है। अपनी सूक्ष्मा दृष्टि से इन्होंने प्रकृति के सूक्ष्म तत्त्वों एवं रहस्यों का उद्घाटन किया तथा इन्हें हृदय में धरकर जीवन्त रूप में सुधी पाठकों के समक्ष रखते हैं।वे प्रकृति के पदार्थों का ऐसा चित्रण करते हैं,मानो वे हमारे समक्ष मूर्त रूप में उपस्थित हों!कालिदास कहते हैं कि प्रकृति जड़ नहीं है,बल्कि उसका एक-एक अंश चेतना से पूरित है। वह भी मनुष्य की ही भाँति सुख-दुःख, आशा-निराशा,हर्ष-शोक तथा ध्यान-चिन्ता का अनुभव करती है।
मेघदूतम् में वे धुआँ,ज्योति,जल तथा हवा के समूह से बने मेघ द्वारा सन्देश भिजवाते हैं। यक्ष अपना सन्देश मेघ से ऐसे कह रहा है,मानो मेघ कोई सजीव प्राणी हो! अभिज्ञानशाकुन्तलम् में जब शकुन्तला की विदाई होती है तो लताएँ आँसू टपकाती हैं,वृक्ष वस्त्र और आभूषण प्रदान करते हैं,वायु के झोकों से फड़फड़ाते किसलय ताल देते हैं तथा भौंरे मधुर संगीत  गुनगुनाते हैं। इनकी रचनाओं में नदियाँ विलासिनी नायिकाओं की भाँति हाव-भाव प्रदर्शित करती हैं तथा चन्द्रमा किरणरूपी अंगुलियों से रजनी नायिका के बिखरे अन्धकार रूप बालों को हटाकर प्रदोषरूप मुख को चूमता है।
 हिमालय-वर्णन,आश्रम-वर्णन,ऋतु-वर्णन यहाँ तक कि युद्ध या करुण विलाप के वर्णन में भी ये प्रकृति का जीवन्त चित्रण करने से नहीं चूकते।पशु-पक्षियों के स्वभाव का यथार्थ चित्रण इनकी रचनाओं में जगह-जगह पर प्राप्त होता है।इतना सब कुछ होते हुए भी महाकवि ने प्रकृति के मात्र रमणीय,कोमल तथा मधुर पक्ष को ही चुना,भीषण तथा भद्दे पहलू को नहीं। इनके इस गुण का अतिक्रमण तो क्या बराबरी भी विश्व का कोई कवि अद्यतन नहीं कर सका है!
                            ✍️ अनुज पण्डित

Monday, April 24, 2023

कालिदास और समुद्रगुप्त से जुड़ी झूठी है यह बात

🍂महाकवि कालिदास तथा समुद्रगुप्त के विषय में वर्षों से चली पल रही मिथ्या धारणा को अब भूलना होगा। "Kalidas is the shakespeare of india" एवं  "Samudragupta is called the nepoleon of india"- ये दोनों उक्तियाँ असंगत हैं। पाश्चात्य कवि तथा शासक को  भारतीय कवि तथा शासक से बेहतर बताने की यह कवायद साफ़ ज़ाहिर करती है कि भारतीय कवि एवं शासक हर मायने में कमतर थे!

कविकुल के गौरव कालिदास को जिसने पढा है,वह यकीन के साथ कह देगा कि कालिदास सदृश कालजयी एवं उद्भट कवि आज तक न हुआ। कुछ मायनों में आदिकवि वाल्मीकि इनसे आगे अवश्य हो सकते हैं किन्तु शेक्सपीअर! कत्तई नहीं। शृंगार रस में सनी हुईं,उपमा अलंकार की बाढ़ से आप्लावित तथा प्रसाद गुण में लिपटीं उनकी रचनाएँ विभिन्न छन्दों की परिधि में नर्तन कर रही हैं। उनका खण्डकाव्य मेघदूतम् पढ़ते-पढ़ते भला किसके दृग् नहीं भीगते! भौगोलिक वर्णन पढ़कर क्या आप यह नहीं बोल पड़ेंगे कि कालिदास का भौगोलिक ज्ञान कितना दुरुस्त था! ऋतुसंहार पढ़ने से सहज ही बोध हो उठता है कि भारत की ऋतुओं की कितनी अच्छी समझ थी इन्हें! शाकुन्तल जैसा नाटक तो विश्वप्रिय है।

अब रही बात नेपोलियन की तो भले ही वह कुशल योद्धा और शासक रहा हो,अनेक लड़ाइयाँ लड़ी हों किन्तु उसका काल स्वर्णकाल नहीं ही था! इसके ठीक विपरीत गुप्त वंश के चौथे शासक समुद्रगुप्त पराक्रमी योद्धा,सफल सेनानायक एवं कुशल प्रशासक तो थे ही,साथ ही उनका काल भारत के स्वर्णयुग के जन्म का काल था।  समुद्र की सीमाओं पर्यन्त अपनी विजय पताका फहराकर उन्होंने भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। भला नेपोलियन की क्या सानी!

इन सब बातों से इतर सबसे महत्तपूर्ण बात यह कि कालिदास शेक्सपीअर के पूर्ववर्ती हैं तथा समुद्रगुप्त नेपोलियन के पूर्ववर्ती, तो यदि कहना ही है तो उक्त दोनों उक्तियों को उलट कर कहना चाहिए- "Shakespeare is the Kalidas of india"  तथा "Nepolean is called the Samudragupta of india."
                             ✍️   अनुज पण्डित

Saturday, April 22, 2023

विश्व पुस्तक दिवस पर खरी-खरी बात

ऐसा माना जाता है कि अपने समय के कालिदास कहे जाने वाले विलियम शेक्सपीअर के निधन-दिवस पर प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को विश्व-पुस्तक दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को ने मनुष्य को पुस्तकों के समीप लाने के लिये वर्ष 1995 में इस दिवस की शुरुआत की ।


मनुष्य को पुस्तकों के समीप लाने की बात से स्पष्ट है कि मनुष्य ने पुस्तकों से पर्याप्त दूरी बना लिया है।यह कहने और सुनने में थोड़ा आश्चर्यजनक लग सकता है किंतु यह कटु सत्य है कि आज के तकनीकी युग में प्रत्येक आयुवर्ग का व्यक्ति पुस्तकों से रिश्ता तोड़ कर इंटरनेट की गोद में आ बैठा है।इंटरनेट पर विभिन्न प्रकार की वेबसाइट्स और सोशल मीडिया जैसे आशियाने हैं जो आज की पीढ़ी के सामाजिक अड्डे बन चुके हैं। 

एक दौर था जब न तो मोबाइल फोन थे,न कंप्यूटर थे और न ही इंटरनेट।पढ़ने और ज्ञान प्राप्त करने के मुख्य स्रोत मात्र पुस्तकें और शिक्षक थे किन्तु सम्प्रति इंटरनेट की दुनिया ने काफी हद तक पुस्तकों और शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों का मोहभंग किया है। माना कि इंटरनेट में लगभग सभी विषय उपलब्ध हो जाते हैं किंतु पुस्तकों से पढ़ने में जो आनन्द और ज्ञान की प्राप्ति होती है वो तकनीकी संसाधनों से नहीं।

पुस्तकें जीवन का वे अनिवार्य अंग हैं जिनके बिना जीवन जीने की कला,सामाजिकता तथा मानवता का बोध अधकचरा रह जाता है। सृष्टि के आदि में  ज्ञान गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित था जिसे बोलकर और सुनकर प्राप्त किया जाता था। कालान्तर में विकासशील मनुष्यों ने गुरुकुलों को विद्यालयों में परिवर्तित कर दिया, जहाँ पर एक व्यवसायी की भाँति शिक्षक माल बेचते हैं और विद्यार्थी ग्राहक की भाँति उसे खरीद लेता है। 

हालाँकि जब तक इंटरनेट की दुनिया में व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी की स्थापना नहीं हुयी थी तब तक मजबूरीवश कुछ विद्यार्थी  ईंट-बालू-पत्थर निर्मित कक्षाओं में बैठकर शिक्षक और पुस्तकों को तवज्जो देते थे किन्तु जब से ब्रह्माण्डीय ज्ञान कंप्यूटर, मोबाइल और टेलिविज़न पर अवतरित हुआ है तब से विद्यार्थी और पुस्तकों का रिश्ता तलाक की कगार पर आ पहुँचा है।


जिस देश की पुस्तकों में वेद,वेदाङ्ग, उपनिषद् और पुराणों से साक्षात्कार होता हो, जिस देश की सभ्यता-संस्कृति और यशगाथा पुस्तकों में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित की गयी हो,उसी देश के विद्यार्थी और अध्ययन-प्रेमी  इन महत्त्वपूर्ण और जीवनोपयोगी पुस्तकों को लाल कपड़े में लपेटकर सन्दूक में भर देते हैं तथा उन्मुख हो जाते हैं इंटरनेट की दुनिया की ओर जहाँ खोखले और अस्थायी ज्ञान की भरमार है!

 यद्यपि आधुनिकता के दौर में इंटरनेट,कंप्यूटर और मोबाइल की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता  क्योंकि इन तकनीकों की मदद से मनुष्य के कई सारे कार्य आसान होते हैं और समय की बचत होती है किंतु अध्ययन हेतु  पुस्तकों की शरण में जाना ही श्रेयस्कर है। ऐसा इसलिए क्योंकि इंटरनेट में पढ़ाई करने से मष्तिष्क और आँख जैसी शारीरिक बीमारियाँ पनपती हैं, मन एकाग्र नहीं हो पाता क्योंकि इंटरनेट में प्राकृतिक और अप्राकृतिक दोनों प्रकार की विषयवस्तु होती है, लिहाजा पढ़ने वाले का मन विचलित और भटकावशील हो जाता है। पुस्तकों के अध्ययन पर बल देने का सबसे बड़ा कारण यह भी है कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में  किसी भी प्रश्न के उत्तर का अंतिम और प्रमाणित साक्ष्य पुस्तकें ही मानी जाती हैं।

  सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि आज की अधिकांश युवा पीढ़ी पढ़ाई-लिखाई को गम्भीरता से लेती ही नहीं। बहुतेरे युवा-युवतियाँ किताबों से मुँह फेरकर चंद लाइक्स और फॉलोवर्स की कामना बलवती किये हुये सोशल साइट्स पर अंग-प्रदर्शन और अश्लीलता  के परीक्षा की होड़ में जुट जाते हैं कि काश इस परीक्षा में सबसे अव्वल होकर हम उन्नति के शिखर पर विराजमान हो सकें!


पुस्तकों की उपयोगिता और महत्ता के विषय में जितना कहा जाये ,कम ही होगा क्योंकि ब्रह्माण्ड की समस्त स्थावर और जङ्गम वस्तुओं का उल्लेख इन्हीं पुस्तकों में ही तो है। जीवन-दर्शन,मानव-मूल्य , पुरुषार्थ और समस्त प्राणी-भाव इन्हीं पुस्तकों में ही तो उकेरे गये हैं! यदि किताबों से मित्रता हो गयी और इन पर मन लग गया तो आपका अपना एक संसार होगा जहाँ ज्ञान-विज्ञान की रौशनी में आपकी आत्मा जगमगा उठेगी तथा समस्त अंधकार रूपी विकार दूर हो जायेंगे। 
अतएव मनुष्य को खासकर विद्यार्थियों को किताबी जीवन से सम्बन्ध प्रगाढ़ करने होंगे ताकि एक योग्य, तार्किक और स्वस्थ मानसिकता वाले व्यक्तित्त्व का विकास हो सके।

किसी ने क्या खूब कहा है-

"इश्क़ कर लो किताबों से बेइन्तहां।

एक ये ही हैं जो,अपनी बातों से पलटा नहीं करतीं।"


💐विश्व-पुस्तक दिवस की शुभकामनाएँ।💐
                       ✍️ अनुज पण्डित
फ़ोटो साभार गूगल

आइये जानते हैं "परशुराम" से जुड़ी ख़ास जनाकारी

🍂सृष्टि के प्रथम राम "परशुराम"

मान्यता है कि इस सृष्टि में कुल सात जन चिरञ्जीवी हैं- "अश्वत्थामा बलिर्व्यासोसो हनूमांश्च विभीषण:।
    कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:।।"
अर्थात् अश्वत्थामा, राजा बलि, वेदव्यास,हनुमान्,विभीषण,कृपाचार्य तथा परशुराम । अब यहाँ पर 'चिरञ्जीवी' का अर्थ "अमर" मत लगा लीजिएगा क्योंकि इस मर्त्यलोक में जो जन्मा है,उसका मरण निश्चित है। लम्बी अवधि तक जीने वाले किसी भी जीव को अमर-संज्ञा दी जा सकती है। वैशाख मास शुक्ल पक्ष की तृतीया को जमदग्नि तथा रेणुका से जन्मे  परशुराम का नाम केवल राम था,बाद में धनुर्विद्या हेतु शिव की उपासना करने से शिव ने प्रसन्न होकर इन्हें एक दिव्य परशु(फरसा) प्रदान किया, तभी से इनका नाम परशु समेत परशुराम पड़ा। भगवान् विष्णु के छठे अवतार परशुराम ही एकमात्र ऐसे अवतार हैं जिनके रहते विष्णु का एक और अवतार हुआ,अन्यथा एक अवतार के रहते दूसरा अवतार कभी न हुआ था। ईश्वर की लीला कितनी विचित्र है न कि एक अवतार दूसरे अवतार को तब तक नहीं पहचान पाया जब तक कि चाप चढ़वाकर परीक्षण न कर लिया! एकमात्र ये ही एक  अवतार हैं जिन्होंने अपने उत्तरवर्ती अवतारों के समय भी अपनी उपस्थिति प्रदान की। महाभारत काल में भीष्म,द्रोण तथा कर्ण को शिक्षा दी तथा कलियुग में भी होने वाले अवतार को शिक्षा देने का   दायित्व इन्हीं का होगा।
 शास्त्र ज्ञान से ब्राह्मण तथा शस्त्र ज्ञान से क्षत्रिय विप्रकुलशिरोमणि परशुराम ने जो भी किया समाज के कल्याण हेतु ही किया। आततायी कार्तवीर्य अर्जुन के वंश के लगभग इक्कीस राजाओं का संहार करके उन्होंने पृथ्वीवासियों को शान्ति तथा अभय प्रदान किया। विष्णु के इस अवतार ने कहीं पर भी अपना ईश्वरत्व प्रकट नहीं किया,बल्कि एक मानव की भाँति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहे। न केवल आतताइयों को मारकर समाज को भयमुक्त किया बल्कि अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देकर समाज को विद्यादान भी किया। वे परशुराम ही थे जिन्होंने सर्वप्रथम नारी सशक्तिकरण का बिगुल फूँका। इस प्रकार परशुराम के रूप में नारायण के इस अवतार ने ब्राह्म तथा क्षात्र दोनों धर्म निभाकर समाज का सर्वविध कल्याण किया।

                                 ✍️ अनुज पण्डित

Wednesday, April 19, 2023

सीता स्वयम्बर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

आख़िर विश्वामित्र ने राम को आज्ञा देने में क्यों बिलम्ब किया ? जनक का परिताप, लक्ष्मण का क्रोध क्यों वे देखे जा रहे थे?क्या कोई और शूरवीर अपना बाहुबल आजमाने को शेष रह गया था या फिर कोई और बात थी जो मात्र विश्वामित्र ही जानते थे? इन्हीं समस्त जिज्ञासाओं के समाधान हेतु पढ़िये मेरा यह लेख👇

आइये, आपको मिथिलानरेश के उस दरबार में ले चलता हूँ,जहाँ सिया के स्वयम्बर  का आयोजन था, जहाँ देश-विदेश से बाहुबली,महाबली नरेश,युवराज तथा नर वेश में देवता,राक्षस,यक्ष तथा अन्य प्रजाति के लोग पधारे थे। जब स्वयम्बर की शर्त इतनी विशेष और जटिल हो तो भला प्रतिभागी सामान्य कैसे हो सकते हैं! शर्त स्वरूप भंग किया जाने वाला कोदण्ड कोई साधारण धनुष नहीं बल्कि साक्षात् महादेव का धनुष "पिनाक" था।  उस धनुष को भंग करना तो दूर की बात,उसे उसकी जगह से हिला-डुला पाना भी टेढ़ी खीर थी।

उस दरबार की शोभा अयोध्या  के दो राजकुमार प्रभु राम और अनुज लक्ष्मण भी अपने गुरु विश्वामित्र-संग बढ़ा रहे थे। विश्वामित्र भले ही मन ही मन जानते रहे हों कि राजकुमारी वैदेही को अंततः मेरा शिष्य राम ही वरेगा किन्तु यकीन मानिए उनके सिवाय और किसी को अंदेशा तक भी नहीं था कि  यह साँवला सजीला नवयुवक कोई साधारण राजकुमार नहीं बल्कि स्वयं अखिल ब्रह्माण्ड का नायक है। हाँ, राम यह बात अवश्य जानते थे कि सिया आखिर में राम की ही होगी,क्योंकि ईश्वर से भला कौन सी बात छिपी है!

समस्त भूपतियों ने बारी-बारी से अपना बाहुबल  आजमाया,यहाँ तक कि हजारों की संख्या में भी सबने मिलकर जोर आजमाया किन्तु शिव-धनुष मानो हिमालय पर्वत की भाँति अडिग था! जनकपुर की महारानी सुनयना सहित मिथिलापति की आँखों से निराशा के मेघ बरसने लगे, सिया भी तनिक उदास  हुईं,जबकि उनका प्रेम और विश्वास मन ही मन अपने जनम-जनम के साथी राम के प्रति था। सीता यह सोचकर उदास हुईं कि मेरे राम तो मात्र यहाँ दर्शक बनकर आये हैं,धनुष-भंग प्रतियोगिता में उन्हें अवसर मिलेगा भी या नहीं क्योंकि सबकी दृष्टि में वे हैं तो बालक ही! फिर भी सीता की  डबडबायी आँखों में एक विश्वास तैर रहा था।

सभा मे सन्नाटा पसर गया, षड्विकारों से रहित विदेहराज को भी अपार क्रोध चढ़ा। उन्होनें दरबार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की ओर नजर घुमाकर,वीरप्रसूता पृथ्वी को वीरविहीन तक कह डाला! अब सब यह मान बैठे थे कि सीता के योग्य कोई पुरुष है ही नहीं। उन्हें क्या पता कि इसी सभा में पुरुषोत्तम राम भी बैठे हैं। बाकी राजा तालाब हैं तो राम समुद्र और सीता जैसी महानदी समुद्र को छोड़कर भला कहाँ मिलेगी!

मिथिलापति ने अपनी शर्त तोड़ दी। यदि राजर्षि कौशिकनन्दन और उनके साथ आये हुए अयोध्या के दोनों राजकुमारों को छोड़कर बात करें तो लगभग समस्त प्रतिभागियों के शिर लज्जा से झुके हुए थे। अब गौर करने वाली बात यह है कि विश्वामित्र ने राम को धनुष भंग की आज्ञा उस समय क्यों नहीं दी,जब विदेहराज समस्त राजाओं,राजकुमारों और शूरवीरों को धिक्कार रहे थे! तब भी नहीं जब उन्होंने पृथ्वी को वीरों से विहीन तक  कह दिया! जनक और सुनयना की आँखों से उमड़ते हुए समुद्र में अविश्वास और निराशा के ज्वार-भाटा भी विश्वामित्र देख रहे थे, फिर भी मन्द मुस्कान लिए हुए वे चुप रहे! 

लक्ष्मण ने अपने क्रोध से जनक के सिंहासन समेत समूची सभा को हिला दिया और यह भी कह गए कि यदि मुझे आज्ञा मिले तो मैं गेंद की भाँति इस धरती को हवा में उछाल दूँ फिर भी विश्वामित्र ने शान्त वत्स! शान्त! के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा! आख़िर विश्वामित्र किसलिए राम को आज्ञा देने में विलम्ब कर रहे थे! क्या उन्हें किसी की प्रतीक्षा थी या विदेहराज के धैर्य की अभी और परीक्षा लेनी थी!  क्या अभी कोई और वीर अपनी भुजाओं का बल आजमाने हेतु शेष रह गया था! इन्हीं जिज्ञासाओं के ज़वाब मैं दूँगा अगली पोस्ट पर। मैं कुछ नया तर्क रखने का यत्न करूँगा। शायद आप सबको पसन्द आये! तब तक आप लोग विचार करें कि आख़िर विश्वामित्र ने राम को आज्ञा देने में एक लम्बा समय क्यों लिया!

मानसकार लिखते हैं-"विस्वामित्र समय सुभ जानी।बोले अति सनेहमय बानी।।उठहु राम भंजहु भव चापा। मेटहु तात जनक परितापा।।" -इन  चौपाइयों को पढ़कर आपके मस्तिष्क में भी प्रश्न कौंध गया होगा कि विश्वामित्र को कैसे पता कि अब धनुषभंग करने का  शुभ समय है! इसका जवाब हो सकता है कि विश्वामित्र नक्षत्र और मुहूर्त के ज्ञाता थे लेकिन जब समस्त प्रतिभागी अपना बाहुबल आजमा रहे थे,तब क्या समय अशुभ था!  बाबा तुलसी आगे फिर लिखते हैं -"लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े।काहुँ न लखा देखु सब ठाढ़े।।" अर्थात् श्री राम ने धनुष को कब हाथ में लिया,कब प्रत्यंचा चढ़ायी और कब तोड़ दिया,यह किसी ने नहीं देखा। राम  फुर्तीले हो सकते हैं किन्तु विश्वामित्र और राम को इतनी क्या जल्दी थी कि पल भर में धनुष को भंग कर दिया! 


विश्वामित्र ने जब राम को आज्ञा दी तो कहा कि हे राम! तुरन्त उठो,तुरन्त जाओ और तुरन्त ही धनुष को तोड़ दो। एक पल की भी देर मत करना। 
यदि विश्वामित्र को इतनी ही जल्दी थी तो अब तक जनक का परिताप क्यों सुन रहे थे! जब समस्त प्रतिभागी विफल हो चुके थे तो  राघव को थोड़ा भौकाल जमाते हुए,चारों तरफ निहारकर इत्मीनान से धनुष भंग करना चाहिए! ताकि सभा  में उपस्थित जन आनन्द उठा पाते! कुछ तो था जो केवल और केवल विश्वामित्र ही जानते थे,अन्यथा जनक और सुनयना को इतनी देर तक आँसू नहीं बहाने पड़ते और न ही लक्ष्मण क्रोधित होकर अपनी ऊर्जा क्षीण करते!

इधर मिथिला में सिया का स्वयम्बर रचाया जा रहा है और उधर सिंहलद्वीप में शिव का जिद्दी भक्त रावण अपनी शैय्या से उठकर बैठ गया। उसे यह चिंता खाये जा रही थी कि राम धनुष तोड़ देंगे और मैं नहीं चाहता कि यह धनुषभंग मेरी जीवनलीला समाप्त करने का सूत्रपात करे। अब चूँकि काल और शनि को रावण बंधक बनाकर रखता था,सो उसकी शैय्या के पास ही रहते थे। दोनों ने पूछा-"क्या बात है लंकापति!आप परेशान क्यों हैं?" रावण ने पूरी बात बतायी तो उन दोनों ने कहा-"आप इसकी चिंता तो छोड़ ही दीजिये। हमारे रहते धनुषभंग कोई नहीं कर सकता। "

सबसे भारी ग्रह शनि ने कहा कि "मैं जाकर उस शिवधनुष में बैठ जाऊँगा, फिर कोई भी उस धनुष को हिला तक न सकेगा।" इतने में काल ने कहा कि "यदि कोई धनुष तोड़ भी दिया तो मैं तत्काल किसी न किसी बहाने से उसका काल बन जाऊँगा और उसकी मृत्यु हो जाएगी।" जनक की सभा में सजे धनुष पर शनि का भार और ऊपर मँडराते हुए काल को विश्वामित्र भलीभाँति देख पा रहे थे,इसीलिए वे राम को आज्ञा देने में विलम्ब कर रहे थे। जब समस्त भूपतियों ने अपना बाहुबल दिखा लिया,जनक निराश होकर शर्त तोड़ चुके तब शनि और काल ने समझा कि अब हमारा काम ख़त्म। अब कोई शेष नहीं बचा,जो आकर धनुष भंग करने की कवायद करेगा,सो हम दोनों को चलना चाहिए।

जैसे ही शनि ने धनुष से अपना प्रभाव अलग किया, वैसे ही विश्वामित्र ने तत्काल राम को आज्ञा दी कि हे राम!उठो,जाओ और तुरन्त धनुष भंग करो क्योंकि उन्हें आशंका थी कि यह शनि पुनः धनुष पर अपना प्रभाव जमा सकता है। इसीलिए बाबा तुलसी कहते हैं कि राम को धनुष उठाते और भंग करते हुए पल भर का भी समय नहीं लगा।


ज्यों ही राघव ने धनुष को प्रणाम किया,शनि शीघ्रता से पलटा किन्तु शनि के पुनः प्रभाव जमाने से पहले राम ने बड़ी फुर्ती से उसके दो टुकड़े कर दिए थे। अब शनि घबराया और काल से कहा कि मेरा काम तो यहीं तक था,अब तुम अपना प्रभाव दिखाओ। तब काल ने महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे परशुराम को प्रेरित किया और वे धनुष भंग करने वाले का साक्षात् काल बनकर आये थे किंतु राम को पहचानने के बाद उनका क्रोध शांत हो गया। 
              ✍️ अनुज पण्डित

Thursday, March 30, 2023

गंगापुत्र का "मात्स्यन्याय" (लॉजिक ऑफ फिश)

महाभारत काल के गंगापुत्र अर्थात् पितामह भीष्म जब अपने ही प्रिय शिष्य धनञ्जय की बनाई हुई बाणशैय्या पर थे, तो  युधिष्ठिर ने उनसे कुछ सीखने-जानने की इच्छा व्यक्त की। तब भीष्म ने युधिष्ठिर को अनेक प्रकार के धर्मों का उपदेश दिया,जिसमें से एक उपदेश था-राजधर्म,जिसका उल्लेख महाभारत के शान्तिपर्व में प्राप्त होता है। 
भीष्म ने कहा कि राज्य की स्थापना के लिए यदि कोई बलशाली व्यक्ति उद्यत हो तो उसके समक्ष सबको ही झुक जाना चाहिए। उन्होंने अराजकता को बड़ा भारी पाप बताया और कहा कि अराजक राज्य शक्तिहीन होकर नष्ट हो जाते हैं। राज्य के विषय में भीष्म की इस अवधारणा को "मात्स्यन्याय" कहा जाता है। जैसे पानी के भीतर निर्बल मछलियों का भक्षण उससे ज्यादा बलशाली मछली कर लेती है,वैसे ही अधिक बलशाली मनुष्य अपने से कमतर बलशाली मनुष्य का धन,स्त्री आदि सब छीन लेता है और उसकी हत्या कर देता है।इसी को मात्स्यन्याय अर्थात् लॉजिक ऑफ फिश कहते हैं।

गंगापुत्र  का मानना था कि लोभ,मोह,काम,क्रोध,मद तथा मत्सर-ये छः विकार ही मात्स्यन्याय के कारण हैं। इन सबसे मुक्त होना सामाजिक जीवन निर्माण का उद्देश्य है।इन्हीं  विकारों पर विजय प्राप्त करना ही "सभ्यता" है।

पढ़ते-पढ़ते                    ✍️ अनुज पण्डित

Tuesday, March 7, 2023

आइये जानते हैं कि क्यों आवश्यक है होलिका दहन एवं रंगोत्सव!

होलिका दहन की धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता को एक पल के लिए नकार भी दोगे लेकिन क्या उसकी वैज्ञानिकता से मुँह बिचका सकोगे?

बिल्कुल भी नहीं। हमारे उत्सव,रीतियाँ एवं परम्पराएँ किसी एक समुदाय या पंथ विशेष के कल्याण हेतु नहीं हैं अपितु विश्वकल्याण एवं एक स्वस्थ समाज को मजबूती प्रदान करने हेतु कटिबद्ध हैं। बेशक आप हिरण्यकशिपु, होलिका एवं प्रह्लाद आदि पात्रों को कपोलकल्पित मानकर नजरअन्दाज कर दीजिये किन्तु तनिक होलिका दहन की वैज्ञानिक प्रामाणिकता पर ध्यान देंगे तो स्वयं हो बोल पड़ेंगे कि वाह! कितना महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी उत्सव है! 

उत्सव...सदा से ही मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं।  दुःख,अवसाद,कुण्ठा, चिंताओं तथा नीरस जीवन से कुछ समय तक स्वयं को मुक्त रखने हेतु मनुष्य सदा उत्सवधर्मी रहा है। शिशिर की विदाई के पश्चात् ऋतुराज के कदम रखते ही वातावरण अँगड़ाई लेता है तथा विशेष परिवर्तन से युक्त होकर हमें अपने प्रभाव से अवगत कराता है। ऋतु परिवर्तन के इस काल में थकान,सुस्ती,उनींद तथा आलस्य का अनुभव होता है। साथ ही इस मौसम में वातावरण में बैक्टीरिया हावी हो जाते हैं,फलस्वरूप संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

होलिका दहन तथा उसमें डाले गए गुग्गुल,राई तथा कर्पूर आदि पदार्थों के प्रभाव से वातावरण के तापमान में बढ़त होती है जिसके कारण संक्रामक बीमारियों का प्रभाव अत्यधिक न्यून हो जाया करता है। जीव विज्ञानियों ने भी दावा किया है कि शुद्ध रूप में अबीर या गुलाल आदि जब साफ पानी के साथ त्वचा पर पड़ता है तो शरीर का आयनमण्डल मजबूत होता है तथा शरीर को ताजगी का अनुभव होता है। आपने देखा होगा कि  हमारा लोकगीत फगुआ तानकर ऊँचे स्वर में गाया जाता है!  ऐसा इसलिए ताकि शरीर से आलस,सुस्ती आदि विकार फुर्र हो जायें और एक नई स्फूर्ति एवं चेतना का संचार हो।

मैंने कहीं पढ़ा था- "पश्चिमी फिजिशियन भी यह कहते हैं कि शरीर में रंगों की कमी हमें कई तरह की बीमारियों की ओर धकेलती है।"

उक्त बातों के अतिरिक्त यह पर्व स्वच्छता का भी प्रतीक है,मच्छर,धूल तथा कीटाणुओं का सफाया करके हम स्वस्थ जीवन का आनन्द तो लेते ही हैं!

                          ✍️ अनुज पण्डित

Sunday, February 19, 2023

एस एस राजामौली की आँखें खोल देगी यह पोस्ट

फिल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखक एस एस राजामौली ने धार्मिक ग्रन्थ पढ़ लिए,तीर्थयात्राएँ भी कर लीं किन्तु दुःखद कि वे "धर्म" को ही नहीं पढ़-समझ पाए! यदि धर्म के विषय में पढ़ा तो यह प्रश्न उठता है कि आख़िर उन्होंने कौन-सी पुस्तक पढ़ ली जिससे इन्हें धर्म शोषण के अतिरिक्त और कुछ  भी नहीं लगा! मैंने पहले भी कहा था और फिर कहता हूँ कि "धर्म की वास्तविक समझ न रखना भी अधर्म है।"
मैंने तो आजतक कोई भी ऐसी प्रामाणिक पुस्तक न देखी जिसमें धर्म को शोषण कहा गया हो! इतने उत्कृष्ट निर्देशक का धर्म को लेकर ऐसा चिन्तन वाकई महदाश्चर्य है। अब इन्हें कौन समझाए कि फ़िल्म निर्देशित करना इनका धर्म है। यदि इनकी दृष्टि में धर्म शोषण मात्र है तो फिर इनका फिल्में बनाना एक प्रकार से शोषण ही हुआ! ऐतिहासिक और पौराणिक सन्दर्भों पर फ़िल्म बनाने वाले निर्देशक की ऐसी मानसिकता! 
इस देश में आख़िर कब लोग धर्म का ठीक-ठीक मायने जानेंगे! धर्म है-आग का जलाना, पानी का शीतलता, वायु का बहना,वृक्षों का प्रसून और फल देना। विद्यार्थियों का धर्म है अध्ययन करना,शिक्षक का धर्म है अध्यापन करना,बिच्छु का धर्म है डंक मारना,भक्त का धर्म है अपने इष्ट की आराधना और भक्ति । और तो और... धर्म है -मानवता। सत्य बोलना,ईमानदार रहना,मन,कर्म,वाणी से पवित्र रहना,धैर्य रखना,क्षमा,इन्द्रियों को नियंत्रित रखना,अपरिग्रह, क्रोध न करना-ये ही लक्षण तो मनु ने भी बताये! क्या कोई कह सकता है कि मानव को इन गुणों से युक्त नहीं होना चाहिए? क्या इनको धारण करना मानवता नहीं? 

इन्हीं गुणों को धारण करने की बात कही गयी। "धारयति इति धर्म:"- धर्म की यह सर्वमान्य परिभाषा चीख-चीख कर यही तो कह रही है। महाभारत के वनपर्व में भी धर्म की परिभाषा का कोई गूढ़ अर्थ नहीं। अत्यंत सरल और बोधगम्य परिभाषा है- "स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्म: स इति निश्चय:"......अर्थात् अपने कर्म में संलग्न रहना निश्चय ही धर्म है। यदि मानवता को कोई धर्म नहीं मानता तो निश्चित रूप से धर्म और कुछ नहीं, बस शोषण है। आप धर्म का वर्गीकरण कर सकते हैं किन्तु शोषण कहना आपकी अज्ञानता है। 
एस एस राजामौली न जाने कौन-सी पुस्तकें पढ़ते हैं! मुझे सन्देह है कि ये पौराणिक और ऐतिहासिक सन्दर्भों पर फिल्में कैसे बनाते हैं! कटप्पा ने बाहुबली को मारा,वह उसका राजधर्म था,रामचन्द्र वनवास चले गए,वह उनका पुत्रधर्म था। समझाओ  कोई इन्हें! 
                 ✍️ अनुज पण्डित

ग्रहण की वैज्ञानिक अवधारणा तथा आर्यभटीय सिद्धांत

🍂प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में ग्रहणों को लेकर प्रचलित पौराणिक धारणाओं के विपरीत, आर्यभट ( पञ्चमी शताब्दी के उत्तरार्ध से षष्ठी शताब्दी के...